अध्यादेश
(आर्डनेंस) किसे कहते हैं?
यदि विधान
मंडल का सत्र न चल रहा हो तो कार्यपालिका द्वारा जारी किया गया अस्थायी नियम
अध्यादेश कहलाता है हालाँकि वह पूरी तरह से कानून होता है और न्यायपालिका उसके
आधार पर न्याय का प्रशासन करती है। यह केवल छह
माह तक ही वैध रहता है। यदि उसके बाद भी उसे जारी रखना हो तो विधान मंडल
द्वारा अधिनियम पारित कराना होता है। कोई भी विधान पारित किए जाने से पहले `विधेयक' (बिल) कहलाता है। जब उसे विधान मंडल द्वारा पारित
कर दिया जाता है और उसे भारत के राष्ट्रपति या प्रदेश के राज्यपाल द्वारा, जो भी लागू हो, अनुमोदित करने के बाद वह कानून (अधिनियम) का रूप
लेता है। अध्यादेश जारी करने की शक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल को होती है।
इसके अलावा
`आचार विधि' (Customary Law) भी कानून होती है जो किसी भी कानून के ऊपर
लागू होती है। कभी-कभी आचार विधि कानून पर भी अभिभावी
हो जाती है, जैसे, हिंदू ला और मुस्लिम ला।
संविधान दो प्रकार के होते हैं
- सुपरिवर्त्य (Flexible) और अपरिवर्त्य (Rigid)
। इन दोनों प्रकार के
संविधानों के उदाहरण, क्रमशः अमरीका और ब्रिटेन हैं। भारत का संविधान
सुपरिवर्त्य संविधान की ओर झुका हुआ है। ब्रिटेन का संविधान लिखित संविधान नहीं है।
वहाँ पर न्यायालयों के निर्णय कानून का रूप ले लेते हैं। हमारे यहाँ के उच्च और
उच्चतम न्यायालयों के निर्णय निचली अदालतों द्वारा निर्णय करने के लिए मार्गदर्शन
के रूप में अपनाए जाते हैं। अतः उन्हें न्याय प्रशासन में न्यायालयों द्वारा
मान्यता दी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार यदि किसी विषय में कोई
अधिनियम न हो और उच्चतम न्यायलय उस विषय में कोई गाइडलाइंस नियत करता है तो वे
गाइड लाइंस तब तक कानून का प्रभाव रखेगा जब तक कि न्याय पालिका उसे कानून का रूप
न दे दे, जैसे, महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न के बारे में कोई
कानून नहीं है। परंतु विशाखा बनाम राजस्थान सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय ने
गाइडलाइंस नियत की है जो काननू के रूप में प्रभावी है। यदि विधायिका चाहे तो उन
निर्णयों को प्रभावी किए जाने से उन्हें निरस्त कर सकती है, जैसे, शाहबानो
के मामले में राजीव गांधी की सरकार ने किया था।


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