Degree Degree
लल्लन
बाबू थोड़ा घबराये से थे। हाथ में एक पर्चा लिए बिंदूमती से बोले, “तुम्हारे प्रमाण पत्र कहाँ हैं? R.T.I. से
किसी ने तुम्हारे दसवीं का सर्टिफिकेट माँगा है। ऑफिस वालों ने कहा है कि दो दिन में मुझे सब कागज़ात
जमा कराने होंगे।”
“हाय दइया... मेरे
प्रमाणपत्र से तुम्हारे ऑफिस वालों का
क्या लेना देना?” बिंदूमती ने
झुंझला कर कहा।
“तुम समझती
नहीं हो। ऐसी बात तो मोदी जी भी नहीं पूछ सकते, हमारी क्या औकात है, R.T.I. कानून के बारे में कुछ जानती भी हो? हर नागरिक के पास अधिकार है कि
वह कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है। अब तुम झमेला मत करो, बस यह बताओ कि तुम्हारा दसवीं
का प्रमाणपत्र कहाँ है।”
“हाय दइया... तुम
से किसने कहा कि मैंने दसवीं पास किया था?”
“क्यों? तुम्हारे बाबूजी ने ही कहा था।
मैं भी वहीं था जब बात हुई थी। हम कोई ऐसे वैसे आदमी थोड़े ही हैं।”
“नहीं, तुम लोग गलत सुने होगे, हम तो चौथी में ही स्कूल छोड़
दिए थे।”
“तुम ने दसवीं
पास नहीं किया। आज तक हमें धोखे में रखा। उस दिन तो तुम बिन्नू से कह रही थी कि
लिख दो की तुम बी. ए. पास हो। अब कह रही हो कि तुम दसवीं भी नहीं हो, सिर्फ चौथी.......। और बिन्नू........।”
“तुम अपनी बात
करो। तुम्हारे अपने प्रमाण पत्र कौन से ठीक हैं। तुम्हारे दसवीं के प्रमाणपत्र में
क्या नाम लिखा है, कुछ याद भी
है।”
अचानक
लल्लन बाबू पचीस साल पीछे पहुँच गए। भर्ती हुए दो साल से ऊपर हो गए थे और उन्हें
एक भी इन्क्रीमेंट न मिला था। साहस कर एक दिन अकाउंटेंट से पूछा, उसने कहा, “क्या सर्विस बुक बन गयी है।”
धर्मिक
बाबू अकचकाते हुए – “वह
क्या होता है?”
“तुम यह भी
नहीं जानते की हर कर्मचारी की सर्विस बुक होती है। सर्विस बुक बनने के बाद ही
इन्क्रीमेंट मिलती है। कल अपने सारे सर्टिफिकेट ले आना। सर्विस बुक बना दूँगा।”
अगले
दिन अकाउंटेंट ने प्रमाणपत्र देख कर कहा, “गड़बड़
है। तुम ने भर्ती के समय फॉर्म में अपना नाम लिखा था, लल्लन बाबू। लेकिन तुम्हारे दसवीं
के प्रमाणपत्र में नाम लिखा है, लल्लन
बाबू लपेटा। यह तुम्हारा प्रमाणपत्र ही है?”
“प्रमाणपत्र
तो मेरा ही है। बस वह लपेटा शब्द कुछ अच्छा न लगता था। इस कारण भर्ती के समय फॉर्म
में नहीं लिखा......।”
“पर यह तो गलत
है। सर्विस बुक में तो वही नाम आयेगा जो प्रमाणपत्र में दर्ज है। पर वह नाम
रिकॉर्ड में नहीं है।”
“अब आप ही कोई
तरीका ढूंढो। न मैं अपना प्रमाणपत्र बदल सकता हूँ, न ऑफिस का रिकॉर्ड।”
अकाउंटेंट
भले-मानस थे, किसी तरह
सर्विस बुक बना दी। नाम भी वही लिखा जो उन्हें पसंद था, लल्लन बाबू। अनुभाग अधिकारी ने
हस्ताक्षर भी कर दिये। एक-आध महीने के बाद इन्क्रीमेंट भी मिल गया। और लल्लन बाबू
भूल गए कि प्रमाणपत्र में क्या नाम लिखा था।
“यह बात तो
मुझे ध्यान में ही न रही। अगर किसी ने R.T.I. का
सहारा ले कर मेरा प्रमाणपत्र मांग लिया तो मेरी तो नौकरी छूट जाएगी।”
“यही बात मैं
समझाने की कोशिश कर रही हूँ। तुम हो की मेरे बाबू जी को ही कोस रहे हो, वह सच कहे थे। तुम लोग ही समझ
न सके तो उनका क्या दोष।”
लल्लन
बाबू कुछ सुन-समझ न रहे थे। वह तो इस चिंता में थे कि कहीं किसी ने उनके दसवीं के प्रमाणपत्र
की कॉपी मांग ली तो फिर क्या होगा¿¿¿¿¿
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