लेन-देन में, या दान-कर्म में, हमेशा उसका पलड़ा भारी होता है, जिसे पैसे देने होते हैं.. भीख मांगने का मतलब ही यही होता है कि आप
किसी और से मेहरबानी चाहते हैं.. लेकिन जब भिख़ारी देखता है सामने एक पुरुष नहीं स्त्री है तो उसकी आर्थिक अक्षमता कम हो
जाती है और पौरुष हावी हो जाता है.. तब वो एक भिख़ारी नहीं, एक पुरुष होता है.. जब दुकान
वाला या ऑटो वाला या कोई और एक औरत से अपनी काम के बदले पैसे ले रहा होता
है, वो ये मानकर चलता है कि
सामने वाली पार्टी के पास दिमाग नहीं है.. दिमाग हो भी तो, उसके पास विरोध करने के लिए आवाज़
नहीं है..
1. हम तीन लड़कियां ऑटो
में थे.. लगभग 10 साल का एक लड़का सिग्नल पर फूल बेच रहा था.. एक लड़की शॉर्ट्स पहनी
थी.. बच्चा ऑटो के पास आया.. कहने लगा – “दीदी फूल ले लो..” हमने उसकी ओर ध्यान न देने का नाटक की.. वो उसकी जांघों पर हाथ रखकर
कहता है – “दीदी ले लो ना..” मैं जब तक हम कुछ समझकर अपने गुस्सा कर
पाती, ऑटो स्टार्ट गया और बच्चा
भाग गया..
2. एक बार दुकान में
सामान लेने गई.. मैंने टैंक टॉप के ऊपर बटन खोलकर शर्ट डाल रखी थी.. दुकान वाला
मेरी आंखों में देख बात नहीं करता.. वो लगातार मेरे सीने को ओर घूरता रहता है.. वो सामान लेने घूमता है..
मैं चेक करती हूं कि मेरा क्लीवेज तो नहीं दिख रहा है.? नहीं मैंने ‘ठीक’ तरीके से कपड़े पहने हैं.. वो
फिर भी मेरे स्तनों से ही बात करता है..
3. रात के नौ साढ़े नौ
बज रहे थे हम तीन सहयोगी दो लड़की और एक लड़का घर जाने के लिए ऑटोरिक्शा लिये थे..
लड़के को बीच में उतरना था.. ऑटो वाले से 200 रुपये तय हो गई.. लड़का थोड़ी दूरी पर
उतर गया.. उसके अगले सिग्नल पर ऑटो वाला कहने लगा – “आप लोगों को उतरना होगा.
क्योंकि ऑटो खराब हो गया है..” हम आधे रास्ते भी नहीं पहुँचे थे.. रात के समय में हम बोलें – “हमें दूसरा ऑटो दिला दो..” ऑटो वाला मना करने लगा.. दूसरे ऑटो वाले ने 150
रुपये मांगे.. वो सफ़र जो हम 200 में तय करने वाले थे, अब हमारे लिए 250 का बन गया..
हम गुस्साएँ, ऑटो वाले से झगड़ें.. वो भी लड़ने
को तैयार हो गया.. आख़िर में हम उसे 100 रुपये देकर पुलिस वाले से शिकायत करने की बात
कही.. धमकी सुनते ही वो बोला – “रुकिए, शायद ऑटो स्टार्ट हो रहा है..” अचानक ऑटो स्टार्ट हो गाय.. लेकिन उसके पहले ऑटो वाला अपनी पूरी जान लगा दी, हमसे एक्स्ट्रा पैसे
निकलवाने के लिए.. मैं रोज ऑटो लेकर ऑफिस से घर आती हूं.. मुझे शाम को अकेला देख
ऑटो वाला 200 मांगता है.. आगर कोई साथ खड़ा होता है तो 150 में भी बात बन जाती है..
कोई लड़का कलीग साथ में हो तो 100 में घर पहुँच जाते हैं..
4. मैं एक सबवे से सड़क
पार कर रही थी.. एक भिख़ारी फटे हुए कपड़े पहने आया.. सबवे में चल रहे आदम़ी उसे
झिड़क चुके थे.. भिख़ारी मेरे पास आया.. मैं तय चुकी थी कि बिना उसको देखे चुपचाप
आगे बढ़ जाऊंगी.. लेकिन भिख़ारी मेरे पीछे-पीछे आने लगा.. लेकिन उस भिख़ारी ने किसी
आदमी का पीछा नहीं किया था.. मैं उसे डराने के लिए उसके तरफ़ गुस्से से देखी.. लेकिन
वो इस तरह से मुस्कुराया, जैसे उससे गुस्सा नहीं प्यार के आमंत्रण दे रही हूँ.. फिर वो अपनी जीभ
से अपने ऊपर वाला होंठ चाट मुझे इशारा किया.. सबवे ख़त्म हो गया.. मैं ऊपर जाने के
लिए सीढ़ियों पर चढ़ गई..
ऑटो वाले.. दुकान वाले.. भिख़ारी.. इनसे हमारा कोई निजी नहीं बल्कि
आर्थिक रिश्ता होता है.. जब हम इनसे मिलते हैं तो हम ‘ग्राहक’ माने भगवान स्वरूप होते
हैं.. मतलब हम उनके अन्नदाता से कोई कम अहमियत नहीं रखते हैं.. लेकिन जब ‘ग्राहक’ स्त्री हो तो ये व्याभिचार
में बदल जाता है.. हलांकि ऐसा हर बार नहीं होता.. फिर भी होता ही रहता है.. स्त्री
संभोग के लिए है, और ये सच्चाई अर्थव्यवस्था में सहयोगी होने के बाद भी बदलती नहीं
दिख रही है..
हम कह सकते हैं कि हम महिलाओं के प्रति काफ़ी उदार हो चुके हैं, अब अर्थव्यवस्था को केवल
पुरुष नहीं चलाते हैं.. लड़कियां भी ऑफिसों में काम करती हैं.. मैं भी बहुत से
लड़कियों को ऑफिस में काम करते देखती हूँ.. लेकिन ऑफिस में काम करने वाली लड़कियों
को जब प्रमोशन मिलता है, या उनके काम की तारीफ़ होती है, लोग कहते हैं कि “लड़की है इसलिए हो गया..” कॉलेजों में प्लेसमेंट होते हैं.. जब उनमें लड़कियों को चुन लिया जाता
है तब लड़के कहते हैं कि “लड़की थी, इसलिए हो गया..” औरतों की किताबें छपती हैं, तो लोग कहते हैं – “इसकी कविताएं तो कुछ ख़ास
नहीं, लेकिन लड़की सुंदर है..”
जब वक़्त रात का हो, उन्हें मालूम होता है कि सामने वाली औरत अपने आप में काफ़ी नहीं, इसे एक पुरुष पर निर्भर होना
है.. और अगर वो पुरुष ऑटो वाला है, तो वो मनचाहे दाम ले सकता है.. इसमें एक सवाल छुपा होता है – “आप क्या चुनना चाहती हैं, अपनी सेफ्टी, या पैसों की बचत.?” ज्यादा पैसे देकर मैं हर बार
अपनी सेफ्टी चुन लेती हूं.. और एक बार फिर सामने वाले की आर्थिक असमर्थता उसके पुरुष होने के
पीछे छिप जाती है..
ये सच है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर औरतें ज्यादा असुरक्षित हैं.. उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट
लेकर पुरुषों के बीच धक्का-मुक्की सहते हुए जाना पड़ता है.. लेकिन वो लड़कियां जो कैब
लेना अफोर्ड कर सकती हैं, या पर्सनल ऑटो बुक कर सकती हैं, वो क्या सेफ हैं.? एक अकेली समर्थ औरत भी घर में प्लम्बर, कारपेंटर या पानी वाले को
बुलाने के पहले सौ बार सोचती है..
औरतें अर्थव्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी, अर्थव्यस्था का वो यूनिट
नहीं होतीं.. जो पैसे देने वाली पार्टी में आकर सक्षम और सेफ महसूस कर सकें.. वो पैसे देने वाली पार्टी
होकर भी महज शरीर बनकर रह जाती हैं..
एक इ-पत्रिका के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट.. ये लेखिका की मूल कृति नहीं है..


बहुत ही स्पष्ट शब्दों में महिलाओं की स्थिति का ज़िक्र है। ऐसा लगा जैसे समाज को आईना दिखाया, मगर अफ़सोस आईने में अपना अक्स कोई नहीं पहचान पायेगा। सब दूसरों को ही देखेंगे।
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