Saturday, June 18, 2016

फ्री सैक्स पर चर्चा

फ्री सेक्स
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अपनी सोसाइटी में एक अराजक किस्म का दोष दाखिल हो चुका है.. बेहद जरूरी मुद्दों पर भी बातचीत राजनीतिक गुटबंदियों और दायरों का शिकार हो जाती है.. सामाजिक वातावरण में अगर कहीं कोई अराजकता का साया हो तो कोई भी समाज नंगा होने में देर नही लगाता.. शराब पिये हुए को नंगा होने में कितना वक़्त लगता है आखिर.? तलाश मात्र एक अवसर की रहती है, बस.. और यह अवसर हाल हाल में तब मुहैया हो गया जब 'फ्री सेक्स' के स्याह सफ़ेद पर बहस चल पड़ी.. यूं देखिये तो भारतीय समाजों में #सेक्स ने अमूमन स्याह रंग ही देखे हैं.. सफ़ेद तो इनमें कुछ होता ही नही.. गांवों में जाइए और कहानियों के पन्ने खोलिए.. एक चित्र मै दिखाता हूँ – दूर दूर तक फैले हुए अरहर के खेत.. और बीच खेत में अपने पालतू पशुओं के लिए घास काटती मजूरिने.. खेतों की मेंड़ों और पगडंडियों से गुजरते लोग.. मजूरिनों के दल में ये जो सबसे अलग, सबसे दूर घास के झुरमुटों में घुसी घास काट रही है, बमुश्किल 15 साल की बेचन दुसाध की बेटी है.. उसका टोकरा जब भरता है तो वो पाती है कि साथ में घास काटने वाली औरतों का झुंड उधर दूर निकल गया है.. वो खड़ी होकर तजबीजती है कि टोकरा सिर पर कैसे उठे.. मेंड से गुजरते लड़कों और प्रौढ़ो की कनखियाई हुई नज़रें लड़की की बेबसी के साथ साथ उसकी देहयष्टि ताड़ती हैं.. इन मैले कुचैले कपड़ों और जुओं से पटे गंदे बालों के नीचे एक वेलटोंड बॉडी तो है ही.. किसी को आवाज़ देने की हिम्मत नही है उसमें क्योंकि अंजाम वो जानती है.. कि तबतक काका मेंघबरन मेंड़ छोड़ देते हैं और गदोरियों में सुरती मलते उसके टोकरे के सामने आ खड़े होते हैं.. उठा दूँ क्या.? हाँ, उसके स्वर सहमें सहमें से हैं.. काका के पीछे पीछे हिम्मत करके दो चार छोकरे भी अंदर खेत दाखिल हो चुके हैं.. चारों तरफ घनी अरहर से ढंका हुआ वातावरण बहुत मुफीद है.. दो हाथ उसके और आठ हाथ इनके, टोकरे पर एक साथ लगते हैं और टोकरा लड़की के सिर पर.. यहाँ रुकना पड़ेगा थोड़ा.. यह दृश्य देखना ही नही, समझना भी पड़ेगा आपको.. लड़की के सिर पर घास से भरा टोकरा है और जिसे संभालने में उसके दोनों हाथ ऊपर उठे हुए हैं.. इधर काका और उनके चेलों की चुटकियाँ मचल रही हैं.. दोनों हाथ ऊपर किए लड़की की छातियाँ मुक्त हैं.. काका इस मजबूरी को हंस हंस के देख रहे हैं.. उनकी चुटकियाँ उसकी छातियाँ मसल रही हैं.. वो कुछ नही कर सकती.. चीख भी नही सकती.. पिटने से लेकर लुटने तक का भय है.. ये पूरी गैंग उसके पीछे पीछे तबतक उसे घेर के चलती है, जबतक अरहर के तने खड़े डंठलों की आड़ बाकी है.. लड़की की देह के सारे हिस्से उनकी चुटकियों में है.. खेत खत्म होता है और खत्म होती है एक अराजक तस्वीर.. ये भारत का सांस्कृतिक प्रपोज़ल है जो एक पंद्रह साला गरीब गुरबे की बेटी को काका भतीजों की हर वय वर्ग की मिली जुली सभ्यता सम्पन्न टोली की तरफ से मिला है..


एक दूसरा दृश्य भी है जहां गन्ने के खेत में मलतिया गोड़िन भरसांय का जलावन बटोर रही है.. उसकी चढ़ती उम्र और सुगठित देह बबुआनों की आँख में किरच-किरच गड़ती है.. निगाहें फिसल फिसल जाती हैं.. जेठ बैसाख की भरी हुई दोपहरी और निर्जन सन्नाटा.. बाबू मलखान सिंह की आँखों में लाल डोरे तिरते चले आते हैं.. उनके कदम गन्ने के खेत की ओर बढ़ रहे हैं.. बाहर खड़े होकर देखा जा सकता है.. अंदर खेत में खड़ी ऊख की फसल चरमराती है, पौधों में आँधी सी आई है.. मलतिया और मलखान का मल्ल युद्ध जारी है.. मलतिया शरीर से मजबूत है लेकिन है तो लड़की ही.. करीब आधे घंटे की कुश्ती ठहरी और अंततः मलतिया नीचे, मलखान ऊपर.. देखने की चीज़ है कि भारत भूमि पर ऊख के घने खेतों में एक खूबसूरत और जवान, उमड़ती हुई उम्र की निर्दोष लड़की के साथ ये सांस्कृतिक सेक्स हो रहा है.. आधे घंटे का तूफान और पसीना पोंछते हुए शेर इधर से, कपड़े संभालती हुई बकरी उधर से खेत से बाहर निकल आए हैं.. एक विजेता है, एक पराजिता है.. दृश्य और भी हैं और आप सभी की आँखों में नाच भी रहे होंगे.. गबरू और शीलवान दिनेश पहलवान की दुल्हन आई है.. आज कंकन भी टूट गए, लेकिन घर के अंदर से लेकर बाहर दरवाजे तक पर कड़ी पहरेदारी है.. संकोच को जगह नही मिलती.. ध्यान रहे यह संकोच सांस्कृतिक है.. यह पहरेदारी सभ्यता का घटाटोप है.. आगे से जगह नही ही मिलती.. दिनेश पहलवान के दोस्तों में व्याकुलता है.. कैसे होगा...! हफ्ता गुजर गया.. नयी नवेली दुल्हन भी क्या सोचती होगी.. इधर घर के पहरेदार सजग हैं कि पहलवानी के सितारे घटने नही देने हैं.. लेकिन उधर एक रात.. आधी रात.. दोस्तों ने प्लान करके दिनेश को घर के पिछवाड़े से छत पर चढ़ा दिया है, इस ताईद के साथ कि घंटे भर में लौट आना.. दोस्त पीछे खेतों में बैठे संस्कृति पाठ का पुनर्वाचन कर रहे हैं और भोर हो जाती है.. कितनी ही आवाज़ें दी गयी हैं लेकिन दिनेश पहलवान अंदर ही सो गए लगते हैं.. अब घर के पिछवाड़े से घर की छत पर ढेले फेंके जा रहे हैं कि समय से पहले जाग जाएँ दोनों.. यह सामाजिक नियमों और सभ्यता के क़ानूनों की चहुं ओर घिरी पहरेदारी में घटे सांस्कृतिक सेक्स की क्या गज़ब गौरवशाली छटा है.. दिनेश ने छत से कूदकर बताया है कि एक ठो दिया भी नही था यार, मुंह तो देखने ही नही पाये, लेकिन बाकी सब हो गया..


दृश्य और भी हैं दोस्तों.. और कोई इन दृश्यों से अपरिचित नही है.. इन सभी दृश्यों में एक कॉमन फैक्टर ये है कि लड़की पैसिव पार्टनर है.. और ये पैसिव होना भी विशुद्ध भारतीय पैटर्न है.. हमारी अपनी सांस्कृतिक पद्धति है.. स्त्री कोई जीती जागती जीव नही, बस एक प्रस्तर योनि है.. पुरुष की आँख, उसकी सोच, उसका टार्गेट, उसके प्रयत्न और उसकी मर्दानगी केवल और केवल एक विंदु बस योनि पर केन्द्रित है.. एक यंत्रवत खेल है, जिसमें स्त्री की भूमिका तो है, पर उसका कोई मन नही है.. भारतीय पुरुषों के बारे में एक आम सच ये है कि वे अपनी स्त्रियॉं को चरम पर नही ले जा पाते.. ये लांछन तुम्हारी मर्दानगी पर बलात्कार के दंश जैसा है संस्कृतिकर्मियों.. शर्म भी नही आती कि सदियों सदियों से तुम्हारी राक्षसी भूख को बिलकुल खामोश, खुद मिटते हुए मिटा रही है स्त्री.. दुनिया के दूसरे समाजों में ऐसा नही होता और उन समाजों कि संस्कृति तुमसे कमजोर भी नही है कहीं से.. आज़ादी और बराबरी का ये खेल भी दोमुंहा है.. पुरुष की बाँहों में जकड़ी हुई स्त्री भारतीय समाज में एक उत्तेजक पदार्थ से ज्यादा कभी कुछ नही रही.. वैसे देखो तो है तो यह तुम्हारे भी प्लेजर और मानवीयता का प्रश्न.. अंतरंग क्षणों में भी अगर वो तुम्हारी लौंडी ही है तो बराबरी की हैसियत कहाँ है फिर.. उन निजी पलों में भी तुम तो मालिक ही बने रहते हो और स्त्री का मन तुमसे बहुत दूर कहीं और राहत खोज रहा होता है, तुम्हें तो बस झेल रहा होता है.. मन एक लेवल पर नही होते तो रासायनिक क्रियाएँ भी एकतरफा होकर नष्ट हो जाती हैं.. दोनों दो पटल पर छूट जाते हैं.. सेक्स और सम्भोग अगर कोई नैसर्गिक क्रिया है तो ये तुम्हारे सेंसर किए जाने की वस्तु तो है नही.. उसकी जरूरत और महत्ता से भी इन्कार तो नही होगा तुम्हें.. अगर ये एकतरफा संतुष्टि ही सांस्कृतिक सम्भोग की उच्चावस्था है तो समझो इन ऊंचाइयों के चक्कर में कुछ गहराइयाँ कहीं छूटती रही हैं तुमसे.. करके देख लो.. मै मानता हूँ कि अगर आज के आज हम सभी की शादियाँ तोड़ दी जाएँ और फिर से चुनने का अवसर स्त्री को मिले तो हममें से अधिकांश पुरुष फिर जोड़े नही पाएंगे, बिनब्याहे ही रह जाएँगे.. अब अगर इन हालात में आज़ादी के स्वर उठाती स्त्री ने फ्री सेक्स कि आवाज़ लगाई है तो उसे साम्यवाद और साम्राज्यवाद के खूँटे पर मत बांधो.. यह निसर्ग की आवाज़ है और पक्का जानो, इसे तुम्हारा पुरुषार्थ मर जाएगा फिर भी तुम रोक नही पाओगे..





समाज के चिंतनशील लोग हमेंशा से चेताते आए हैं कि बंद करो अपने ये घिसे पिटे सुर.. जो आवाज़ें सुनी नही जातीं, वे एक दिन विस्फोट करती हैं और ये विस्फोट की ही आवाज़ है, अगर तुम पहचान सको.. फ्री सेक्स के पक्ष में आ रहे विचार उसी विस्फोट के स्वर हैं.. भूल जाओ कि तुम दूसरे की देह पर अब भी अपना कानून चला सकते हो.. हमेंशा नियंत्रण नही रख सकते तुम.. यह बेजा हरकत है.. दबा के रखी गयी आवाज़ें ब्लास्ट करती हैं तो संस्कृति की खोखली नीवें दरक ही जाती हैं.. बदलना है तो अपने सेक्स संस्कार बदलो.. अगर फ्री सेक्स को उसके वास्तविक अर्थों में ग्रहण नही करोगे तो निश्चित जानो सेक्स फ्री होकर रह जाओगे.. जो है भी, वो नही बचेगा.. बिलकुल हक़ है हर स्त्री को कि वो अपनी देह की मालिक खुद हो.. उसकी भी नैसर्गिकता है.. उसे भी पुरुष ही चाहिए, शेर नही.. लेकिन वो अपना पुरुष ढूंढ लेगी, पहले भी ढूंढ लेती रही है, तुम जान ही कब पाये.. इतना जरूर याद रखना कि कितनी भी समर्पिता और गूंगी गुड़िया हो, पुरुषों के खिलाफ हर स्त्री के पास उसकी अपनी रणनीति होती ही होती है..

Prem Prakash जी के फेसबुक वाल से..


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