Monday, June 27, 2016

Join BJP IT cell


NSG की विफलता भी अब आम आदमी पार्टी के मत्थे मढ़ी जा रही है। कल से सोशल मीडिया पर देख रहा हूँ NSG की विफलता को लेकर बेवकूफ मोदीभक्तों का गुस्सा केजरीवाल पर फूट रहा है। कोई कह रहा है रमजान के महीने में केजरीवाल की मुराद पूरी हुई, कोई केजरीवाल की तुलना जयचंद से कर रहा है तो कोई केजरीवाल को देश के लिए मनहूस कह रहा है। एक हद तो ये भी देखी कि 2015 में दिल्ली चुनाव की सफलता के जश्न वाले "आप" कार्यकर्ताओं के कुछ फोटो को सोशल मीडिया पर ये कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि भारत को NSG सदस्यता न मिलने का जश्न आम आदमी पार्टी के कार्यालय के बाहर मनाया जा रहा है। इस देश के हर नागरिक के मन की ईच्छा थी कि भारत को NSG सदस्यता मिले। किसी कट्टर से कट्टर मोदीविरोधी ने ये नहीं कहा कि भारत को NSG की सदस्यता नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मोदी बैठे है। लेकिन हँसी आती है जब कुछ पढ़े लिखे गँवार सोशल मीडिया पर उन सारे ट्रोल्स जो इधर से उधर करते है जो BJP IT सेल तैयार करती है। अमूमन सोशल मीडिया के प्लेटफार्म आपकी विचारधारा के प्रचार के लिए होते है लेकिन BJP IT सेल सोशल मीडिया पर कृत्रिम विचारधारा विकसित करने का धंधा खोलकर बैठी है। एक व्यक्ति को किसी घटना को कैसे देखना है, देखकर उसका क्या अर्थ लगाना है और क्या प्रतिक्रिया देनी है ये सब BJP IT सेल से संचालित हो रहा है। और इस गंदगी के झांसे में आने वाले वो लोग है जिन्होंने हमेशा किसी भी विषय पर राय रखने के लिए अपने "दिमाग" का से ज़्यादा दुसरे की प्रतिक्रिया और हावभाव पर ज़्यादा भरोसा किया। मेरा परिवार, मेरा भविष्य, मेरा घर, मेरी तरक्की तक सीमित रहने वाले ये लोग पूरा टैक्स भरें न भरें, पड़ोस में हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ न उठाएं, अपना काम करवाने के लिए रिश्वत लेने देने से इनकार न करें लेकिन फुरसत मिलते ही दिन का एक हिस्सा देशप्रेम के लिए आरक्षित रखते है। इसीलिए उनकी इस क्षणभंगुर देशभक्ति में उन्हें "उचित नेतृत्व" उस तरफ दिखाई देता है जिस तरफ सिवाए झूठ, फरेब, मक्कारी, नफरत, सनक और घमंड के अलावा और कुछ नहीं है देश को देने के लिए।

Sunday, June 26, 2016

आप योग करते हैं या योगा?


आप योग करते हैं या योगा?

अगर आप आजकल में देखादेखी कुछ व्यायाम कर रहे हैं तो ये योगा है योग नहीं है। आप चाहें या न चाहें लेकिन आप योगगुरु बाबा रामदेव के परोपकार के नीचे दब गए हैं। आपपर एक ठप्पा लगा दिया जाएगा की अगर बाबा रामदेव जी नहीं होते तो कोई माई का लाल आज योगा नहीं कर रहा होता। वैसे एक रिकॉर्ड ये भी है कि एक टाइम बाबाजी के योगा से ज्यादा पूनम पांडे जी के योगा लोगों को पसंद आया और ज्यादा देखा गया। उसके साथ मोदी सरकार के आ जाने के बाद तो बाबाजी राजवैद्ध ही बन गए। फिर तो गनिमत मानिए की उनका उत्तसर्जित पदार्थ अभी तक कोई चमत्कार न कर पाया वर्ना लोग मूत्र, मल, कफ और न जाने किन-किन चीज़ों को मिलाकर दवाइयाँ बना देते हैं। ये तो फिर भी बाह्य उपचार पद्मति और शैली है।
हाँ तो योग तो मित्रों वह है, जो बनारस के सूर्य-विज्ञानी स्वामी विशुद्ध-आनन्द को सिद्ध था। महर्षि अरविंद योगी थे।
एक अंग्रेज पॉल ब्रन्टन महोदय की एक पुस्तक है "गुप्त भारत की खोज" उसे पढ़िये, पता चल जायगा कि वास्तव में योग क्या है। अंत में इतना ही कहूँगा, कि 'सच्चा योग' पंडाल लगा कर कदापि नहीं सीखा सिखाया जा सकता है। योगी तो पैदा हुआ करते हैं।
#भयानक_मोदीभक्त 

Tuesday, June 21, 2016

₹१०० का इको एसी 🎄

ये है सबसे सस्ता इको एसी
ज्यादा कुछ नहीं करना.. केवल पचास साठ खाली प्लास्टिक के बोतलों का जुगाड़ कर लीजिए.. बोतलों को आधा काटिए.. बोतलों के खुले मुँह वाले हिस्से को किसी बोर्ड में फिट करके खिड़की से चिपका दीजिए.. न किच-किच न झिक-झिक.. न टाटा को कोसना न अम्बानी को रोना.. बिजली भी बचेगी और दिमाग़ भी टका-टक रहेगा.. धन सम्पत्ति में बरकत होगा.. देवी मइया तो बहुते परसन्न होगी.. 


किताबी बातें निचे है - 👇🏼 👇🏼 💭 🏊 🎄


A/C का उपयोग किसी भी कमरे के तापमान को कम करने के लिए किया जाता है.. लेकिन यह बिजली भी बहुत खाता है और महंगा भी आता है.. लेकिन एक ऐसा A/C तैयार किया गया है ​जो बिना बिजली के चलता है.. और कमरे का तापमान 5° नीचे ले आता है और इसे बनाने में मात्र १०० रुपए का खर्चा आता है। अब तक इसकी २५००० से ज्यादा यूनिट घरों में लगी हुईं हैं.. इसे ECO AC का नाम दिया गया है..



यह एसी प्लास्टिक की खाली बोतलों से बनाया जाता है.. इस एसी को आशीष पॉल नाम के व्यक्ति ने डिज़ाइन किया है.. यह एसी बनाना बहुत आसान है.. इसमें प्लास्टिक की खाली बोतलों को आधा काटा जाता है फिर कटी हुई बोतलों का अगला हिस्सा एक एक करके बोर्ड पर चिपकाया जाता है.. इस बोर्ड को किसी खिड़की पर लगाया जाता है.. ध्यान इतना रखना है कि बोतल का ढक्कन वाला हिस्सा कमरे के भीतरी हिस्से में और पिछला हिस्सा बाहर की तरफ किया जाता है.. इसकी ख़ास बात यह है कि यह खाली प्लास्टिक की बोतलों से बन जाता है और शहर भी प्लास्टिक के कचरे से सुरक्षित रहता है..

ऐसे लगाएँ इको एसी

Saturday, June 18, 2016

फ्री सैक्स पर चर्चा

फ्री सेक्स
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अपनी सोसाइटी में एक अराजक किस्म का दोष दाखिल हो चुका है.. बेहद जरूरी मुद्दों पर भी बातचीत राजनीतिक गुटबंदियों और दायरों का शिकार हो जाती है.. सामाजिक वातावरण में अगर कहीं कोई अराजकता का साया हो तो कोई भी समाज नंगा होने में देर नही लगाता.. शराब पिये हुए को नंगा होने में कितना वक़्त लगता है आखिर.? तलाश मात्र एक अवसर की रहती है, बस.. और यह अवसर हाल हाल में तब मुहैया हो गया जब 'फ्री सेक्स' के स्याह सफ़ेद पर बहस चल पड़ी.. यूं देखिये तो भारतीय समाजों में #सेक्स ने अमूमन स्याह रंग ही देखे हैं.. सफ़ेद तो इनमें कुछ होता ही नही.. गांवों में जाइए और कहानियों के पन्ने खोलिए.. एक चित्र मै दिखाता हूँ – दूर दूर तक फैले हुए अरहर के खेत.. और बीच खेत में अपने पालतू पशुओं के लिए घास काटती मजूरिने.. खेतों की मेंड़ों और पगडंडियों से गुजरते लोग.. मजूरिनों के दल में ये जो सबसे अलग, सबसे दूर घास के झुरमुटों में घुसी घास काट रही है, बमुश्किल 15 साल की बेचन दुसाध की बेटी है.. उसका टोकरा जब भरता है तो वो पाती है कि साथ में घास काटने वाली औरतों का झुंड उधर दूर निकल गया है.. वो खड़ी होकर तजबीजती है कि टोकरा सिर पर कैसे उठे.. मेंड से गुजरते लड़कों और प्रौढ़ो की कनखियाई हुई नज़रें लड़की की बेबसी के साथ साथ उसकी देहयष्टि ताड़ती हैं.. इन मैले कुचैले कपड़ों और जुओं से पटे गंदे बालों के नीचे एक वेलटोंड बॉडी तो है ही.. किसी को आवाज़ देने की हिम्मत नही है उसमें क्योंकि अंजाम वो जानती है.. कि तबतक काका मेंघबरन मेंड़ छोड़ देते हैं और गदोरियों में सुरती मलते उसके टोकरे के सामने आ खड़े होते हैं.. उठा दूँ क्या.? हाँ, उसके स्वर सहमें सहमें से हैं.. काका के पीछे पीछे हिम्मत करके दो चार छोकरे भी अंदर खेत दाखिल हो चुके हैं.. चारों तरफ घनी अरहर से ढंका हुआ वातावरण बहुत मुफीद है.. दो हाथ उसके और आठ हाथ इनके, टोकरे पर एक साथ लगते हैं और टोकरा लड़की के सिर पर.. यहाँ रुकना पड़ेगा थोड़ा.. यह दृश्य देखना ही नही, समझना भी पड़ेगा आपको.. लड़की के सिर पर घास से भरा टोकरा है और जिसे संभालने में उसके दोनों हाथ ऊपर उठे हुए हैं.. इधर काका और उनके चेलों की चुटकियाँ मचल रही हैं.. दोनों हाथ ऊपर किए लड़की की छातियाँ मुक्त हैं.. काका इस मजबूरी को हंस हंस के देख रहे हैं.. उनकी चुटकियाँ उसकी छातियाँ मसल रही हैं.. वो कुछ नही कर सकती.. चीख भी नही सकती.. पिटने से लेकर लुटने तक का भय है.. ये पूरी गैंग उसके पीछे पीछे तबतक उसे घेर के चलती है, जबतक अरहर के तने खड़े डंठलों की आड़ बाकी है.. लड़की की देह के सारे हिस्से उनकी चुटकियों में है.. खेत खत्म होता है और खत्म होती है एक अराजक तस्वीर.. ये भारत का सांस्कृतिक प्रपोज़ल है जो एक पंद्रह साला गरीब गुरबे की बेटी को काका भतीजों की हर वय वर्ग की मिली जुली सभ्यता सम्पन्न टोली की तरफ से मिला है..


एक दूसरा दृश्य भी है जहां गन्ने के खेत में मलतिया गोड़िन भरसांय का जलावन बटोर रही है.. उसकी चढ़ती उम्र और सुगठित देह बबुआनों की आँख में किरच-किरच गड़ती है.. निगाहें फिसल फिसल जाती हैं.. जेठ बैसाख की भरी हुई दोपहरी और निर्जन सन्नाटा.. बाबू मलखान सिंह की आँखों में लाल डोरे तिरते चले आते हैं.. उनके कदम गन्ने के खेत की ओर बढ़ रहे हैं.. बाहर खड़े होकर देखा जा सकता है.. अंदर खेत में खड़ी ऊख की फसल चरमराती है, पौधों में आँधी सी आई है.. मलतिया और मलखान का मल्ल युद्ध जारी है.. मलतिया शरीर से मजबूत है लेकिन है तो लड़की ही.. करीब आधे घंटे की कुश्ती ठहरी और अंततः मलतिया नीचे, मलखान ऊपर.. देखने की चीज़ है कि भारत भूमि पर ऊख के घने खेतों में एक खूबसूरत और जवान, उमड़ती हुई उम्र की निर्दोष लड़की के साथ ये सांस्कृतिक सेक्स हो रहा है.. आधे घंटे का तूफान और पसीना पोंछते हुए शेर इधर से, कपड़े संभालती हुई बकरी उधर से खेत से बाहर निकल आए हैं.. एक विजेता है, एक पराजिता है.. दृश्य और भी हैं और आप सभी की आँखों में नाच भी रहे होंगे.. गबरू और शीलवान दिनेश पहलवान की दुल्हन आई है.. आज कंकन भी टूट गए, लेकिन घर के अंदर से लेकर बाहर दरवाजे तक पर कड़ी पहरेदारी है.. संकोच को जगह नही मिलती.. ध्यान रहे यह संकोच सांस्कृतिक है.. यह पहरेदारी सभ्यता का घटाटोप है.. आगे से जगह नही ही मिलती.. दिनेश पहलवान के दोस्तों में व्याकुलता है.. कैसे होगा...! हफ्ता गुजर गया.. नयी नवेली दुल्हन भी क्या सोचती होगी.. इधर घर के पहरेदार सजग हैं कि पहलवानी के सितारे घटने नही देने हैं.. लेकिन उधर एक रात.. आधी रात.. दोस्तों ने प्लान करके दिनेश को घर के पिछवाड़े से छत पर चढ़ा दिया है, इस ताईद के साथ कि घंटे भर में लौट आना.. दोस्त पीछे खेतों में बैठे संस्कृति पाठ का पुनर्वाचन कर रहे हैं और भोर हो जाती है.. कितनी ही आवाज़ें दी गयी हैं लेकिन दिनेश पहलवान अंदर ही सो गए लगते हैं.. अब घर के पिछवाड़े से घर की छत पर ढेले फेंके जा रहे हैं कि समय से पहले जाग जाएँ दोनों.. यह सामाजिक नियमों और सभ्यता के क़ानूनों की चहुं ओर घिरी पहरेदारी में घटे सांस्कृतिक सेक्स की क्या गज़ब गौरवशाली छटा है.. दिनेश ने छत से कूदकर बताया है कि एक ठो दिया भी नही था यार, मुंह तो देखने ही नही पाये, लेकिन बाकी सब हो गया..


दृश्य और भी हैं दोस्तों.. और कोई इन दृश्यों से अपरिचित नही है.. इन सभी दृश्यों में एक कॉमन फैक्टर ये है कि लड़की पैसिव पार्टनर है.. और ये पैसिव होना भी विशुद्ध भारतीय पैटर्न है.. हमारी अपनी सांस्कृतिक पद्धति है.. स्त्री कोई जीती जागती जीव नही, बस एक प्रस्तर योनि है.. पुरुष की आँख, उसकी सोच, उसका टार्गेट, उसके प्रयत्न और उसकी मर्दानगी केवल और केवल एक विंदु बस योनि पर केन्द्रित है.. एक यंत्रवत खेल है, जिसमें स्त्री की भूमिका तो है, पर उसका कोई मन नही है.. भारतीय पुरुषों के बारे में एक आम सच ये है कि वे अपनी स्त्रियॉं को चरम पर नही ले जा पाते.. ये लांछन तुम्हारी मर्दानगी पर बलात्कार के दंश जैसा है संस्कृतिकर्मियों.. शर्म भी नही आती कि सदियों सदियों से तुम्हारी राक्षसी भूख को बिलकुल खामोश, खुद मिटते हुए मिटा रही है स्त्री.. दुनिया के दूसरे समाजों में ऐसा नही होता और उन समाजों कि संस्कृति तुमसे कमजोर भी नही है कहीं से.. आज़ादी और बराबरी का ये खेल भी दोमुंहा है.. पुरुष की बाँहों में जकड़ी हुई स्त्री भारतीय समाज में एक उत्तेजक पदार्थ से ज्यादा कभी कुछ नही रही.. वैसे देखो तो है तो यह तुम्हारे भी प्लेजर और मानवीयता का प्रश्न.. अंतरंग क्षणों में भी अगर वो तुम्हारी लौंडी ही है तो बराबरी की हैसियत कहाँ है फिर.. उन निजी पलों में भी तुम तो मालिक ही बने रहते हो और स्त्री का मन तुमसे बहुत दूर कहीं और राहत खोज रहा होता है, तुम्हें तो बस झेल रहा होता है.. मन एक लेवल पर नही होते तो रासायनिक क्रियाएँ भी एकतरफा होकर नष्ट हो जाती हैं.. दोनों दो पटल पर छूट जाते हैं.. सेक्स और सम्भोग अगर कोई नैसर्गिक क्रिया है तो ये तुम्हारे सेंसर किए जाने की वस्तु तो है नही.. उसकी जरूरत और महत्ता से भी इन्कार तो नही होगा तुम्हें.. अगर ये एकतरफा संतुष्टि ही सांस्कृतिक सम्भोग की उच्चावस्था है तो समझो इन ऊंचाइयों के चक्कर में कुछ गहराइयाँ कहीं छूटती रही हैं तुमसे.. करके देख लो.. मै मानता हूँ कि अगर आज के आज हम सभी की शादियाँ तोड़ दी जाएँ और फिर से चुनने का अवसर स्त्री को मिले तो हममें से अधिकांश पुरुष फिर जोड़े नही पाएंगे, बिनब्याहे ही रह जाएँगे.. अब अगर इन हालात में आज़ादी के स्वर उठाती स्त्री ने फ्री सेक्स कि आवाज़ लगाई है तो उसे साम्यवाद और साम्राज्यवाद के खूँटे पर मत बांधो.. यह निसर्ग की आवाज़ है और पक्का जानो, इसे तुम्हारा पुरुषार्थ मर जाएगा फिर भी तुम रोक नही पाओगे..





समाज के चिंतनशील लोग हमेंशा से चेताते आए हैं कि बंद करो अपने ये घिसे पिटे सुर.. जो आवाज़ें सुनी नही जातीं, वे एक दिन विस्फोट करती हैं और ये विस्फोट की ही आवाज़ है, अगर तुम पहचान सको.. फ्री सेक्स के पक्ष में आ रहे विचार उसी विस्फोट के स्वर हैं.. भूल जाओ कि तुम दूसरे की देह पर अब भी अपना कानून चला सकते हो.. हमेंशा नियंत्रण नही रख सकते तुम.. यह बेजा हरकत है.. दबा के रखी गयी आवाज़ें ब्लास्ट करती हैं तो संस्कृति की खोखली नीवें दरक ही जाती हैं.. बदलना है तो अपने सेक्स संस्कार बदलो.. अगर फ्री सेक्स को उसके वास्तविक अर्थों में ग्रहण नही करोगे तो निश्चित जानो सेक्स फ्री होकर रह जाओगे.. जो है भी, वो नही बचेगा.. बिलकुल हक़ है हर स्त्री को कि वो अपनी देह की मालिक खुद हो.. उसकी भी नैसर्गिकता है.. उसे भी पुरुष ही चाहिए, शेर नही.. लेकिन वो अपना पुरुष ढूंढ लेगी, पहले भी ढूंढ लेती रही है, तुम जान ही कब पाये.. इतना जरूर याद रखना कि कितनी भी समर्पिता और गूंगी गुड़िया हो, पुरुषों के खिलाफ हर स्त्री के पास उसकी अपनी रणनीति होती ही होती है..

Prem Prakash जी के फेसबुक वाल से..


Tu Le Chal Kahin..

India.:
चांदी की साइकल.. सोने की सीट.. आओ चले डार्लिंग.. चलें डबल सीट..

































Chandi ki cycle sone ki seat
Aao chale darling chale double seat
Chandi ki cycle sone ki seat
Aao chale darling chale double seat
Chandi ki cycle sone ki seat
Aao chale darling chale double seat
Hum bhi jawa hai tum bhi jawa ho
Bolo ji bolo chalna kaha hai

Aaye hai hum tum gokul ke gaanv mein
Bansi bazau main pado ki chhanv mein
Tu hai govinda main teri radha
Nacha kare hum jamuna kinare
Koi janam ho mere sanam ho
Tutegi na apni preet
Aao chale darling chale double seat
Chandi ki cycle sone ki seat
Aao chale darling chale double seat

Aao vaha chalenge jaha
Main jana chati hoon, chaloge
Arey kah ke to dekho
Jaha bhiga bhiga mosam ho
Hum ho or tum ho

Barse rey barse amber se pani
Bhige rey bhige meri jawani
Ho barse rey barse amber se pani
Bhige rey bhige meri jawani

Shola bani hai chadti jawani
Ab ye laga hai teri diwani
Bijali nache badal gaye
Hum dono ke geet
Aao chale darling chale double seat
Chandi ki cycle sone ki seat
Aao chale darling chale double seat.


Song Lyricists: Hasrat Jaipuri
Music Composer: Anu Malik
Music Director: Anu Malik
Director: Kishore Vyas
Music Label: Venus
Starring: Bhanupriya, Govinda, Juhi Chawla
Release on: 23rd August, 1991

Thursday, June 16, 2016

Females are not a Customer..

लेन-देन में, या दान-कर्म में, हमेशा उसका पलड़ा भारी होता है, जिसे पैसे देने होते हैं.. भीख मांगने का मतलब ही यही होता है कि आप किसी और से मेहरबानी चाहते हैं.. लेकिन जब भिख़ारी देखता है सामने एक पुरुष नहीं स्त्री है तो उसकी आर्थिक अक्षमता कम हो जाती है और पौरुष हावी हो जाता है.. तब वो एक भिख़ारी नहीं, एक पुरुष होता है.. जब दुकान वाला या ऑटो वाला या कोई और एक औरत से अपनी काम के बदले पैसे ले रहा होता है, वो ये मानकर चलता है कि सामने वाली पार्टी के पास दिमाग नहीं है.. दिमाग हो भी तो, उसके पास विरोध करने के लिए आवाज़ नहीं है..


1.         हम तीन लड़कियां ऑटो में थे.. लगभग 10 साल का एक लड़का सिग्नल पर फूल बेच रहा था.. एक लड़की शॉर्ट्स पहनी थी.. बच्चा ऑटो के पास आया.. कहने लगा – दीदी फूल ले लो..” हमने उसकी ओर ध्यान न देने का नाटक की.. वो उसकी जांघों पर हाथ रखकर कहता है – “दीदी ले लो ना..” मैं जब तक हम कुछ समझकर अपने गुस्सा कर पाती, ऑटो स्टार्ट गया और बच्चा भाग गया..


2.         एक बार दुकान में सामान लेने गई.. मैंने टैंक टॉप के ऊपर बटन खोलकर शर्ट डाल रखी थी.. दुकान वाला मेरी आंखों में देख बात नहीं करता.. वो लगातार मेरे सीने को ओर घूरता रहता है.. वो सामान लेने घूमता है.. मैं चेक करती हूं कि मेरा क्लीवेज तो नहीं दिख रहा है.? नहीं मैंने ठीकतरीके से कपड़े पहने हैं.. वो फिर भी मेरे स्तनों से ही बात करता है..


3.         रात के नौ साढ़े नौ बज रहे थे हम तीन सहयोगी दो लड़की और एक लड़का घर जाने के लिए ऑटोरिक्शा लिये थे.. लड़के को बीच में उतरना था.. ऑटो वाले से 200 रुपये तय हो गई.. लड़का थोड़ी दूरी पर उतर गया.. उसके अगले सिग्नल पर ऑटो वाला कहने लगा – आप लोगों को उतरना होगा. क्योंकि ऑटो खराब हो गया है..” हम आधे रास्ते भी नहीं पहुँचे थे.. रात के समय में हम बोलें – हमें दूसरा ऑटो दिला दो..” ऑटो वाला मना करने लगा.. दूसरे ऑटो वाले ने 150 रुपये मांगे.. वो सफ़र जो हम 200 में तय करने वाले थे, अब हमारे लिए 250 का बन गया.. हम गुस्साएँ, ऑटो वाले से झगड़ें.. वो भी लड़ने को तैयार हो गया.. आख़िर में हम उसे 100 रुपये देकर पुलिस वाले से शिकायत करने की बात कही.. धमकी सुनते ही वो बोला – रुकिए, शायद ऑटो स्टार्ट हो रहा है..” अचानक ऑटो स्टार्ट हो गाय.. लेकिन उसके पहले ऑटो वाला अपनी पूरी जान लगा दी, हमसे एक्स्ट्रा पैसे निकलवाने के लिए.. मैं रोज ऑटो लेकर ऑफिस से घर आती हूं.. मुझे शाम को अकेला देख ऑटो वाला 200 मांगता है.. आगर कोई साथ खड़ा होता है तो 150 में भी बात बन जाती है.. कोई लड़का कलीग साथ में हो तो 100 में घर पहुँच जाते हैं..


4.         मैं एक सबवे से सड़क पार कर रही थी.. एक भिख़ारी फटे हुए कपड़े पहने आया.. सबवे में चल रहे आदम़ी उसे झिड़क चुके थे.. भिख़ारी मेरे पास आया.. मैं तय चुकी थी कि बिना उसको देखे चुपचाप आगे बढ़ जाऊंगी.. लेकिन भिख़ारी मेरे पीछे-पीछे आने लगा.. लेकिन उस भिख़ारी ने किसी आदमी का पीछा नहीं किया था.. मैं उसे डराने के लिए उसके तरफ़ गुस्से से देखी.. लेकिन वो इस तरह से मुस्कुराया, जैसे उससे गुस्सा नहीं प्यार के आमंत्रण दे रही हूँ.. फिर वो अपनी जीभ से अपने ऊपर वाला होंठ चाट मुझे इशारा किया.. सबवे ख़त्म हो गया.. मैं ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों पर चढ़ गई..


ऑटो वाले.. दुकान वाले.. भिख़ारी.. इनसे हमारा कोई निजी नहीं बल्कि आर्थिक रिश्ता होता है.. जब हम इनसे मिलते हैं तो हम ग्राहक माने भगवान स्वरूप होते हैं.. मतलब हम उनके अन्नदाता से कोई कम अहमियत नहीं रखते हैं.. लेकिन जब ग्राहक स्त्री हो तो ये व्याभिचार में बदल जाता है.. हलांकि ऐसा हर बार नहीं होता.. फिर भी होता ही रहता है.. स्त्री संभोग के लिए है, और ये सच्चाई अर्थव्यवस्था में सहयोगी होने के बाद भी बदलती नहीं दिख रही है..


हम कह सकते हैं कि हम महिलाओं के प्रति काफ़ी उदार हो चुके हैं, अब अर्थव्यवस्था को केवल पुरुष नहीं चलाते हैं.. लड़कियां भी ऑफिसों में काम करती हैं.. मैं भी बहुत से लड़कियों को ऑफिस में काम करते देखती हूँ.. लेकिन ऑफिस में काम करने वाली लड़कियों को जब प्रमोशन मिलता है, या उनके काम की तारीफ़ होती है, लोग कहते हैं कि लड़की है इसलिए हो गया.. कॉलेजों में प्लेसमेंट होते हैं.. जब उनमें लड़कियों को चुन लिया जाता है तब लड़के कहते हैं कि लड़की थी, इसलिए हो गया.. औरतों की किताबें छपती हैं, तो लोग कहते हैं – “इसकी कविताएं तो कुछ ख़ास नहीं, लेकिन लड़की सुंदर है..”

जब वक़्त रात का हो, उन्हें मालूम होता है कि सामने वाली औरत अपने आप में काफ़ी नहीं, इसे एक पुरुष पर निर्भर होना है.. और अगर वो पुरुष ऑटो वाला है, तो वो मनचाहे दाम ले सकता है.. इसमें एक सवाल छुपा होता है – आप क्या चुनना चाहती हैं, अपनी सेफ्टी, या पैसों की बचत.?” ज्यादा पैसे देकर मैं हर बार अपनी सेफ्टी चुन लेती हूं.. और एक बार फिर सामने वाले की आर्थिक असमर्थता उसके पुरुष होने के पीछे छिप जाती है..

ये सच है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर औरतें ज्यादा असुरक्षित हैं.. उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेकर पुरुषों के बीच धक्का-मुक्की सहते हुए जाना पड़ता है.. लेकिन वो लड़कियां जो कैब लेना अफोर्ड कर सकती हैं, या पर्सनल ऑटो बुक कर सकती हैं, वो क्या सेफ हैं.? एक अकेली समर्थ औरत भी घर में प्लम्बर, कारपेंटर या पानी वाले को बुलाने के पहले सौ बार सोचती है..


औरतें अर्थव्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी, अर्थव्यस्था का वो यूनिट नहीं होतीं.. जो पैसे देने वाली पार्टी में आकर सक्षम और सेफ महसूस कर सकें.. वो पैसे देने वाली पार्टी होकर भी महज शरीर बनकर रह जाती हैं..

एक इ-पत्रिका के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट.. ये लेखिका की मूल कृति नहीं है..

Tuesday, June 14, 2016

मोदी से पहले एक और मोदी

बात तब की है जब बाबरी मस्जिद नहीं टूटी थी, अडवानी की रथ-यात्रा शुरू हो तो चुकी थी मगर गाँवो में किसी को कुछ खास पता नहीं था, हिन्दू मुस्लिम सब मिलकर रहा करते थे.. मेरे गाँव में भी वही माहौल था.. बेहद खूबसूरत.. मैनें अपनी सिर पर अपने गाँव में एकमात्र बन रही मस्जिद के लिए मिट्टी ढोयी है, बदले में वो लोग भी वैसा ही करते थे.. जब बात छप्पर चढ़ाने की आती थीं तो कोई हिंदू मुस्लिम नहीं देखता था। हिन्दू-मुस्लिम के मेल-मिलाप की जड़े कितनी गहरी थी, मेरे परिवार में घटित एक वाक्या बताता हूँ।

मेरे फूफा मरने के पहले कहा करते थे, मेरी तो आल-औलाद अपनी है नहीं मैं जब मरुं तो मुझे अयोध्या में फूंकना.. उनका विश्वास था कि, इससे उनकी आत्मा नहीं भटकेगी.. स्वर्ग मिलेगा।
आखिर वो घड़ी आयी.. रात ठीक 12 बजे वो मरे थे.. घर में उस समय सबसे बड़ा जवान मैं ही था जो कक्षा 6 में पढ़ता था.. माँ ने कहा उनकी आखरी इच्छा पूरी ही करनी है.. इत्तिफ़ाक़ से पैसे भी समय से मिल गये थे मगर इंतजाम करेगा कौन.. इतने रिश्तेदारों को बुलाना जमा करना, बस बुक करना.. और भी तमाम काम.. मगर गाँव में एकता इतनी जबर्दस्त थी कि, सभी ने आधी रात ही काम बांट लिये.. अनारुल्लाह शहर निकल पड़े बस लाने, मुहम्मद खलील दौड़ पड़े पंडित और सामान लाने.. और भी दर्जनों नाम.. मैं भी आधी रात में ही निकल गया रिश्तेदारों को इकट्ठा करने.. सबने मिलकर ऐसा काम किया कि, सुबह सूर्योदय तक सब इकट्ठा भी हो गये और दोपहर तक अयोध्या भी पहुँच गये.. और शामतक पूरा क्रिया-कर्म करके घर वापसी भी.. पता ही नहीं चला कौन हिंदू है कौन मुस्लिम साथ में.. जो कभी ये काम किये हों वो जानते हैं इसमें कितना टिट्टिमा पंडित कराते हैं.. मगर,

आगे अडवानी की रथ-यात्रा और दीवारों पर पुतले नारे.. लोगों को बैचेन करने लगे .. लोग कानाफूसी करते.. डरते.. गजब घबराहट दिखाई देती लोगों के चेहरे पर.. ऐसा लगता कुछ टूट रहा है.. जैसे जंग छिड़नेवाली है अपनों के ही बीच.. और फिर वो दिन आ गया.. बाबरी मस्जिद ढहा दी गयीं.. पुलिस और दरोगा की गस्त बड़ गयी.. यहाँ तक कि, रास्तों पर चार लोगो को बैठ-बतियाने को भी मना किया गया.. खैर हमारे यहाँ तो कुछ नहीं हुआ.. मगर पुरे देश में दंगे हुए..
ये इसलिए लिखना पड़ा है आज कि, सोसल मीडिया पर कुछ लोग बहुत बवाल काट रहें हैं यूपी की एक घटना पर.. और इसमें घी कौन-कौन डाल रहें हैं.. पहचान करें ऐसे लोगों की.. बहुत जरूरी है.. यूपी चुनाव तक ये किसी भी हद्द तक जा सकते हैं.. इनकी ताकत भी बहुत है.. जो लोग पुरे देश में दंगे करा सकते हैं.. उनके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है.. मगर देखना है इनके काठ की हांडी कितनी बार चढ़ती है क्योंकि मंदिर वाला वो खूनी मुद्दा तो ये खुद जानते हैं नहीं चलेगा.. ये कुछ नया लाएंगे.. कुछ तो प्लान जरूर करेंगे.. होशियार रहें इन गद्दारों से.. और संयमित रख्खे खुद को.. अधिक से अधिक..

- स्वतंत्र

Monday, June 13, 2016

कैराना A deception

आतंकवादी मीडिया ने कैराना को इतना बदनाम कर दिया है कि सबकुछ जानते हुए भी एकबार खुद कैराना जाकर हालात का जायजा लेने से खुद को नहीं रोक पायावहाँ जाकर जो देखा सुना वो यहाँ साझा कर रहा हूं.

2013 के दंगे की मार अभी तक झेल रही है

कैराना में घुसने से पहले ही भूरा रोड पर खेतों के बीच झुग्गियों में पड़े पांच सौ मुस्लिम परिवार दिखे, 2013 के दंगो के बाद से ये लोग बिना शिक्षा और चिकित्सा सुविधा के बद से बदतर हालात में जिंदगी गुजारने को मजबूर है.. 2013 से ही कभी गर्मियों में 48 डिग्री तापमान के साथ सूरज इन्हे झुलसा रहा है.. कभी आंधी इनकी झुग्गियों को उड़ा ले जाती है..

कभी बारिश भरी रात छोटे छोटे नौनिहालों के साथ भीग भीगकर गुजारनी पड़ती है.. तो कभी पारे के 2 डिग्री से भी नीचे आने के कारण दूधमूहे बच्चों और बुजुर्गों को पाला असमय मौत दे जाता है..

इस ईलाके में कम से कम पन्द्रह और ऐसे ही दंगाईयो से खौफ़जदा विस्थापितो की बस्तियाँ इसी तरह इंसानी जिंदगियों का सहारा बनी हुई हैं।

खैर इनकी छोड़ो, बात करते हैं असल मुद्दे की, यानी कैराना से भाजपा प्रायोजित तथाकथित पलायन की.. इसी सिलसिले में सबसे पहले मुलाकात हुई भाजपा द्वारा पलायन करने वालो की जारी लिस्ट में सबसे पहला स्थान पाने वाले कोल्ड ड्रिंक व्यापारी ईश्वर चंद उर्फ बिल्लू जी की.. ईश्वर चंद उर्फ बिल्लू जी से बात करने पर बिल्लू जी ने ऑन कैमरा बताया की 16 अगस्त 2014 की रात में पांच छः बदमाश उनके घर आये और उनसे बीस लाख रुपये की रंगदारी नहीं देने पर परिवार सहित जान से मारने की धमकी देकर चले गये.. उसके बाद अगले तीन दिनों तक उन्होंने स्थानीय भाजपा नेताओं सहित मदद के लिए हर मुमकिन दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन कहीं से भी संतुष्टि नहीं मिलने पर मजबूर होकर 19 अगस्त की रात उन्होंने परिवार सहित कैराना से पलायन कर दिया.. उनके पलायन के पीछे हिन्दू मुस्लिम नफरत जैसे किसी कारण को पूछने पर उन्होंने ऐसी किसी भी बात से इंकार करते हुए बताया कि उनके यहाँ काम करने वाले छब्बीस कर्मचरियों में से बाईस कर्मचारी मुसलमान ही थे और आज भी यहाँ उनके बचे खुचे कारोबार और सम्पत्ति की देखभाल के लिए एकमात्र मुस्लिम नौकर ही है।

16 अगस्त 2014 की रात में पांच छः बदमाश उनके घर आए और
उनसे बीस लाख रुपये की रंगदारी नहीं देने पर परिवार सहित जान
से मार देने की धमकी देकर चले गए
16 अगस्त 2014 की रात में पांच छः बदमाश उनके घर आये और उनसे बीस लाख रुपये की रंगदारी नहीं देने पर परिवार सहित जान से मारने की धमकी देकर चले गये..
फिर जारी लिस्ट में 33 नंबर पर मौजूद अनिल जैन जी से बात हुई.. उन्होने बताया कि वो चार साल पहले ही अपना कारोबार शामली मन्डी में होने के कारण शामली आ गये थे और गगन विहार शामली में आलिशान कोठी बनाकर आराम से रह रहे हैं.. लिस्ट में मौजूद डॉ मनोज के भाई कमल ने बताया कि उनके भाई ने गुजरात में फैक्ट्री लगाई हुई है.. वो इसलिए गुजरात चले गये और वो यहाँ कैराना में ही आराम से मेडिकल स्टोर चला रहे हैं..

पलायन करने वाले 341 लोगों की लिस्ट में 231 और 232 नंबर पर मौजूद सुबोध जैन एडवोकेट और सुशील एडवोकेट की क्रमशः सात साल और पन्द्रह साल पहले ही हत्या हो चुकी है.. जिनमे एक सुबोध जैन की हत्या के आरोपी अमित विश्वकर्मा आदी हिन्दू ही जेल गये थे और एक की हत्या में सांसद हुक्म सिंह के नजदीकी उनके सजातीय दबंग का नाम पुलिस ने मुकदमे से निकाल दिया था.. क्योंकि उस वक्त हुकुम सिंह प्रदेश की भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री के बाद दूसरा स्थान रखते थे

ऐसे ही 341 लोगों (ना की परिवारों की) की लिस्ट में अधिकतर लोग कोई बीस साल पहले तो कोई पन्द्रह साल पहले किसी ना किसी कारोबारी सिलसिले के चलते दिल्ली नोएडा जैसी जगहों पर शिफ्ट हो चुके हैं.. मूला पंसारी और एक दो परिवार जरूर मुकीम काला गैंग के रंगदारी मांगने पर कैराना से सैंकडो मुस्लिम परिवारों के साथ पलायन कर गये हैं.. नाम उजागर नाम करने की शर्त पर तीन मुस्लिम परिवार ऐसे भी मिले जिन्होंने गैंग के लोगों को दस दस और बीस बीस लाख रंगदारी के देकर अपनी जान बचाई थी (मुकीम और गैंग अब जेल में है).. अब बात करते हैं मुकीम गैंग द्वारा कैराना में अंजाम दी गई घटनाओं की.. तो थाने से पता चला की मुकीम गैंग ने कैराना क्षेत्र में छः हत्याएं की है जिनमे व्यापारी राजू और उसके भाई सहित दो हिन्दू और कल्लू.. काला खुरगान निवासी दोनो सगे भाई.. एक जन्धेडी निवासी और फुरकान उर्फ काला निवासी बलवा सहित चार मुसलमानों की हत्या की है।

इस घर को हिंदू विस्थापितों का घर
दिखाकर सहानुभूति बटोरी जा रही
है जबकि ये घर एक मुस्लिम
मौहम्मद जमा का निकला
इस घर को हिन्दू विस्थापितों का घर दिखाकर सहानभूति बटोरी जा रही है जबकि ये घर एक मुस्लिम मौहम्मद जमा का निकला
फिर थाने जाकर वर्ष 2014 का रिकॉर्ड देखने पर पता चला की उस साल वहाँ हत्याओं के कुल 22 अभियोग पंजीकृत हुए थे.. जिनकी हत्या के आरोपी राजेन्द्र शिवकुमार बन्धुओं के मुस्लिम मुकीम काला आदि है.. विनोद की हत्या में फुरकान, अमित हिन्दू-मुस्लिम दोनों है.. राजेन्द्र की हत्या में रविन्द्र हिन्दू है.. सचिन की हत्या में सपट्टर हिन्दू आरोपी है.. उपरोक्त पांच के आलावा बाकी सभी हत्याएं मुस्लिमों की ही हुई है.. जिनमे वासिल की हत्या के लिए परवेज.. मुरसलीन और एक अन्य की हत्या में उसकी पत्नी.. जाबिर की हत्या में इसरार.. सालिम की हत्या में अज्ञात.. वकील की हत्या में सलमान.. शहजाद की हत्या में हाशिम आदी.. नईम की हत्या में जनाब.. मजाहिर की हत्या में मोहसिन आदि.. सालिम की हत्या में कासिम आदि.. अजीमा की हत्या में शमशाद.. शीबा और रिजवाना की हत्या में शमीम आदि.. तालिब की हत्या में रुकमदीन आदि आरोपी है….

बाकी 341 लोगों की लिस्ट ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वो कुल पन्द्रह बीस परिवारों के ही सदस्य है ना की 341 परिवार हैं.. इसके अलावा डेढ़ लाख से अधिक आबादी वाले ऐतिहासिक नगर कैराना में एक भी महिला MBBS डॉ• नहीं है.. अधिकतर डिलिवरी के मामलों में लोगों को पानीपत या शामली दौड़ना पड़ता है.. अच्छी शिक्षा के लिए हजारों बच्चे रोजाना शामली या दूसरे प्रदेश हरियाणा के पानिपत शहर में पढ़ने जाते हैं.. अच्छे रेस्तरां अच्छे थियेटर में फिल्म देखने या स्तरीय शांपिग जैसी बात तो कैराना में बहुत दूर की कौड़ी है ही..

अब मेरा सवाल है कि कैराना से सात बार के विधायक प्रदेश सरकार में कई बार पांच पांच छः छः मंत्रालय अपने पास रखने वाले भाजपा के सांसद महोदय हुकूम सिंह जी से कि जब उन्होंने पिछले चालिस सालों में कैराना के लिए इतना भी नहीं किया कि वो अपने खुद के परिवार को भी कैराना में रख सकें तो आम साधन सम्पन्न हिन्दू या मुसलमान कैराना में आखिर क्यों रहे?

















 – लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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