Thursday, March 31, 2016

ख़बर शायद नई न हो --- लेकिन है इम्पॉर्टेंट... 

अभी कई घंटों से इस बात पर माथा पच्ची की जा रही थी कि बार में नाच होगा कि नहीं?
फिर झमेला हुआ कि उसमें पुलिस वालों के लिए कैमरे लगाए जाएँ या नहीं???
अब नए वाला ये है कि - महाराष्ट्र में बार बालाओं को छूने या उनपर नोट लूटाए जाने पर छः महीने तक का ससुराल का सफ़र हो सकता है।
- मामू पिरामिड
इस पर लोलबा चुटकी लेते हुए कहता है - भइया ई बतलाईए कि, इतने दिनों से जो हज़ारो करोड़ रुपए ख़र्च करके मुम्बइया फिलिम वाले हमको सिखाए हैं कि 'भार (बार) में जाओ तो पहले तो सट-सटा के नाचो और उसके बाद नोट लूटाओ' का क्या होगा??

Wednesday, March 30, 2016


Good Evening Friends 


आप शहर में रहते हैं ! आप अमीर हैं लेकिन ध्यान से देखिये आपके पास असल में कुछ भी नहीं है ना सब्जी ना गेहूं ना मछली ना दूध ना सोना ना हीरा आपके पास सिर्फ कागज का रुपया है आपने कागज के रुपए खुद ही छाप लिये।इस कागज का एक काल्पनिक मूल्य है जैसे कि एक सौ रुपए के बदले कितना सब्जीगेहूंमछलीदूधसोनाहीरा मिलेगा आदि

अब इन कागज के रुपयों को अगर कोई सब्जीगेहूंमछलीदूधसोनाहीरा से ना बदले तो आप के काग़जी रुपए की कीमत जीरो है और तब आप अचानक एकदम गरीब हो जायेंगे इसलिये जब कोई आपका रुपया अपनी असली सम्पत्ति से बदलने से इनकार करता है तो आप उसे मजबूर करने के लिये अपने हथियारबंद सिपाही भेजते हैं जैसे बस्तर में आदिवासियों ने अपनी असली दौलत ज़मीन को आपकी नकली काग़जी दौलत से बदलने से मना किया तो आपने अपनी सेना आदिवासियों को मारने के लिये भेज दी

गाँव गाँव में असली दौलत के मालिक किसानों पर आपकी सेना इसी नकली दौलत को स्वीकार कराने के लिये हमला कर रही है इसे ही आप मुक्त अर्थव्यवस्था कह्ते हैं लेकिन यह पूरी तरह से बन्दूक के दम पर ही चलाई जा सकती है क्योंकि यह पूरी तरह अवैज्ञानिक अर्थव्यवस्था है आपके पास इसे सही सिद्ध करने के लिये कोई तर्क नहीं है इसलिये आप इस व्यवस्था को चुनौती देने वाले विचार को आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ी चुनौती कह्ते हैं

आप पहले तो बंदूक के दम पर लोगों से असली दौलत छीन लेते हैं फिर आप उन्हें अपने काग़जी रुपयों के लिये काम करने को मजबूर स्थिती में ले आते हैं लोग आपके काग़जी रुपए के बदले काम करें इसी में आपकी इस व्यवस्था का जीवन है

यह व्यवस्था करोड़ों किसानोमछुआरोंखनिकोंमजदूरों की व्यवस्था नहीं हो सकती यह लुटेरी व्यवस्था है यह हथियारों के बल पर ही चल सकती है यह कभी भी अहिंसक नहीं हो सकती यह कभी भी लोकतांत्रिक नहीं हो सकेगी इसमें से गरीबी गैरबराबरीयुद्ध विनाश ही निकलेगा
हिमांशू जी के फेसबुक पेज से

Tuesday, March 29, 2016


महिलाओं को तो आईना दिख जाना चाहिए, बस...।

इसके बारे में एक शाय़र ने क्या खूब कहा है -


आईना देखे है वो इस नाज़-ओ-अदा से,
और ये भी देखे है कि कोई देखता न हो।


ह्वाट्सएप्प पर मिलने वाले
ज्ञान और मैसेज भी इस 
सीढ़ी की तरह ही होते हैं।




यही तस्वीर है हमारे लोकतंत्र के चयन प्रक्रिया की

नेता हमसे तरह-तरह के वादे करके एक बार वोट झटक लेते हैं
और फिर उसके बाद अपना हक़ माँगने पर ऐसे ही लात मारते हैं।

Monday, March 28, 2016

अपने इस ब्लॉग के बारे में तो मैं सिर्फ इतना ही कह सकती हूँ कि मैं बहुत कुछ कर के भी कुछ नहीं कर सकती सिवाय खुद को बदलने के...
शब्द जो छूट गए हैं अगले पन्ने पर जारी होंगे,
तब तक के लिए आज्ञा चाहती हूँ।