Monday, July 25, 2016

इजराइली औरत ने लिफ्ट ली, बदमाशों ने उसका गैंगरेप कर डाला

मनाली में संडे को एक टूरिस्ट का गैंगरेप हुआ. वो इजराइल से थी. घूमने के लिए निकली थी. अनजाने लोगों से लिफ्ट ले बैठी. वो लोग उसे उसके डेस्टिनेशन के बजाए कहीं और ले गए. और रेप किया. मामले में पुलिस ने दो गिरफ्तारी की है.

25 साल की टूरिस्ट कुछ दिन पहले ही मनाली आई थी. ओल्ड मनाली में ब्रह्मा गेस्ट हाउस है, वहीं पर रुकी हुई थी. ये इलाका इजराइलियों के घर के माफिक है. जो भी इजराइल से मनाली आता है, इसी गेस्ट हाउस में अपने कूल्हे टिकाता है.

उस औरत ने स्पीति घाटी के हेड ऑफिस काजा घूमने जाने का प्लान बना रखा था. संडे को सुबह-सुबह निकल पड़ी. हडिंबा रोड पर खड़ी होकर टैक्सी का वेट कर रही थी.

काफी टाइम हो गया था वेट करते. अचानक एक गाड़ी आई. उस पर नंबर प्लेट नहीं था. जाने की जल्दी में औरत को कुछ नहीं सूझा. उन अनजान लोगों से उसने लिफ्ट ले ली. गाड़ी में कुल 6 लोग भरे थे. वे लोग औरत को काजा के बजाए किसी दूसरी जगह ले गए. और गैंगरेप किया. फिर उसे वहीं छोड़कर भाग गए.

जैसे-तैसे खबर पुलिस तक पहुंची. औरत से पुलिस ने पूछ-ताछ किया. उसने बताया कि उसे नहीं पता, वो लोग उसे कहां ले गए थे. और ये भी नहीं पता कि वो लोग थे कौन. उसने बताया कि केवल दो लोगों ने ही उसका रेप किया है. इसके बाद पुलिस लगी है सीसीटीवी फुटेज खंगालने में. जिससे उस गाड़ी या फिर लोगों के बारे में कुछ जानकारी मिल जाए. SP कुल्लू पद्म चंद ने बताया कि औरत की मेडिकल जांच हो गई है. रिपोर्ट आनी बाकी है.

मनाली में विदेशियों से रेप का ये पहला मामला नहीं है. साल 2013 में एक अमरीकी औरत के साथ गैंगरेप हुआ था. वो भी लिफ्ट मांग रही थी. आरोपियों ने तो रेप के बाद उसे लूटा भी था.

Friday, July 15, 2016

Kashmir



कश्मीर किसका --- ?

1815 से पहले आज "कश्मीर" के नाम से जाने जाने वाले क्षेत्र को "पंजाब पहाड़ी राज्यों" के रूप में जाना जाता था और इसमे 22 छोटे स्वतंत्र राज्य शामिल थे। इन छोटे राज्यों मे राजपूत राजाओं के द्वारा जो (मुगल साम्राज्य के प्रति निष्ठावान थे) शासन किया जाता था। वास्तव में पंजाब के पहाड़ी राज्यों के राजपूत मुगल साम्राज्य का एक प्रमुख शक्ति थे और उन्होने सिखों के खिलाफ मुगलों के समर्थन में कई लड़ाइयां लड़ी थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय और मुगल साम्राज्य के बाद के पतन के बाद सिख पहाड़ी राज्यों की सत्ता को अस्वीकार करने लगे. इसलिए सिख गुरू महराजा रणजीत सिंह इन छोटे राज्यों पर जीत के लिए रवाना हो गये . अंततः एक के बाद एक सभी पहाड़ी राज्यों महराजा रणजीत सिंह ने विजय प्राप्त करी थी और इनको एक राज्य में विलय करके जम्मू का राज्य कहा जाने लगा .

जे हचिंसंन और जे पी वोगेल द्वारा लिखित पंजाब जातियों का इतिहास मे दिये वर्णन के अनुसार 22 राज्यो मे 16 राज्यों हिंदु और 6 मुस्लिम थे। इनमे 6 मुस्लिम राज्यो मे दो राज्यों (कोटली और पुंछ) मंग्रालो दो (भीमबेर और खारी-खैरियाला) छिब्ब के द्वारा राजौरी जरालो द्वारा और किश्तवाड़ियों के द्वारा किश्तवाड़ पर शासन किया जाता था |

प्रथम ब्रिटिश सिख युद्ध के सिख साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1845 और 1846 के बीच में लड़ा गया था, के बाद् 1846 में लाहौर की संधि में, सिखों को 12 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति भुगतान करने की आवश्यकता थी।

क्योंकि वे इस् राशि का भुगतान नही कर सके ईस्ट इंडिया कंपनी ने डोगरा शासक गुलाब सिंह को 750,000 रुपये का भुगतान करने के बदले में सिख राज्य से कश्मीर प्राप्त करने की अनुमति दी. गुलाब सिंह जम्मू और कश्मीर राज्य के संस्थापक बन नव गठित राजसी राज्य के प्रथम महाराजा बन गये। जम्मू और कश्मीर की रियासत भारत के 1947 में अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने तक ब्रिटिश राज के दौरान की दूसरी सबसे बड़ी रियासत थी |

१९४७ मे अंग्रेजो के भारत छोड़ने के पहले और बाद मे जम्मू एवं कश्मीर की रियासत पर नये बने दोनो राष्ट्रों मे से एक मे विलय का भारी दबाव था। भारत के बटवारे पर हुए समझौते के दस्तावेज के अनुसार रियासतो के राजाओं को दोनो मे से एक राष्ट्र को चुनने का अधिकार था परंतु कश्मीर के महाराजा हरी सिंग अपनी रियासत को स्वतंत्र रखना चाहते थे और उन्होने किसी भी राष्ट्र से जुड़ने से बचना चाहा। अंग्रेजो के भारत छोड़ने के बाद रियासत पर रियासत पर पाकिस्तानी सैनिको और पश्तूनो के कबीलाई लड़ाको (जो कि उत्तर पश्चिमी सीमांत राज्य के थे) ने हमला कर दिया।

इस भय से कि रियासत की फ़ौज इनका सामना नही कर पायेगी महाराजा ने भारत से सैनिक सहायता मांगी। भारत ने सैनिक सहायता के एवज मे कशमीर के भारत मे विलय की शर्त रख दी। महाराजा के हामी भरने पर भारत ने इस विलय को मान्यता दे दी और रियासत को जम्मु कश्मीर के नाम से नया राज्य बना दिया। भारतीय सेना की टुकड़ियां तुरंत राज्य की रक्षा के लिये तैनात कर दी गयी। किंतु इस विलय की वैधता पर पाकिस्तान असहमत था। चूंकि जाति आधारित आंकड़े उपलब्ध नही थे इसलिये महाराज के भारत से विलय के पीछे क्या कारण थे यह तय पाना कठिन था।

पाकिस्तान की यह दलील थी कि महाराजा को भारतीय सेना बुलाने का अधिकार नही था क्योंकि अंग्रेजो के आने के पहले कशमीर के महाराजा का कोई पद नही था और यह पद केवल अंग्रेजो की नियुक्ती थी। इसलिये पाकिस्तान ने युद्ध करने का निर्णय लिया पर उसके सेना प्रमुख डगलस ग्रेसी ने इस आशय के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का आदेश मानने से इंकार कर दिया। उनका तर्क यह था कि कश्मीर पर कब्जा कर रही भारतीय सेनाएं ब्रिटिश राजसत्ता का प्रतिनिधित्व कर रही हैं अतः वह उससे युद्ध नही कर सकते। हालांकि बाद मे पाकिस्तान ने सेनाएं भेज दी पर तब तक भारत करीब करीब दो तिहायी कश्मीर पर कब्जा कर चुका था

यह युद्ध पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सीमाओं के भीतर भारतीय सेना अर्धसैनिक बल और पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सेनाओं औरपाकिस्तानी सेना अर्धसैनिक बल औरपाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत राज्य के कबीलाई लड़ाको जो खुद को आजाद कश्मीर की सेना के नाम से पुकारते थे के बीच लड़ा गया था। प्रारंभ मे पूर्व जम्मू और कश्मीर रियासत की सेना आजाद कश्मीर के कबीलाई लड़ाको के शुरुवाती हमलो के लिये तैयार नही थी उसे केवल सीमा की रखवाली के लिये बहुत कम संख्या मे तैनात किया गया था इसलिये उनकी रक्षा प्रणाली आक्रमण के सामने तुरंत ढह गयी और उनकी कुछ टुकड़िया दुश्मनो से जा मिली।

आजाद कश्मीर के कबीलाई लड़ाके शुरूवाती आसान सफ़लताओं के बाद लूटपाट मे व्यस्त हॊ गये और उन्होने आगे बढ़ आसानी से कब्जे में आ सकने वाले नये इलाको पर हमला करने मे देर कर दी और महाराजा कए भारत मे विलय मे सहमती देते ही भारतीय सेना को विमानो की मदद से सैनिक पहुचाने का मौका दे दिया। १९४७ के अंत तक कश्मीर मे कब्जा करने के पकिस्तानी अभियान की हवा निकल गयी। केवल हिमालय के उपरी हिस्सो मे आजाद कश्मीर नाम की पाकिस्तानी सेना को कुछ सफ़लतायें मिली पर आखिर मे उन्हे लेह के बाहरी हिस्से से जून उन्नीस सौ अड़तालीस मे वापस खदेड़ दिया गया। पूरे १९४८ के दौरान दोनो पक्षो के बीच अनेक छोटी लड़ाइयां हुई पर किसी को भी कोई मह्त्वपूर्ण सामरिक सफ़लता नही मिली और धीरे धीरे एक सीमा जिसे आज नियंत्रण रेखा के नाम से जाना जाता है स्थापित हो गई। ३१ दिसम्बर १९४८ मे औपचारिक युद्ध विराम की घोषणा हो गयी।

इस युद्ध को दस भागो मे बाटा जा सकता है। यह भाग इस प्रकार से हैं।

शुरूवाती हमला (गुलमर्ग का अभियान)

शुरूवाती हमले का मुख्य उद्देश्य कश्मीर घाटी और इसके प्रमुख शहर श्रीनगर के नियंत्रण को अपने हाथ मे लेना था। जम्मू और कश्मीर रियासत (अब राज्य) की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर और शीतकालीन राजधानी जम्मू थी। मुज्जफ़राबाद और डोमेल मे तैनात रियासत की सेना तुरंत ही आजाद कश्मीर सेना नाम की पाकिस्तानी सेना से हार गयी (रियासत की सेना का एक धड़ा आजाद कश्मीर सेना से जा मिला था) और श्रीनगर का रास्ता खुल गया था। रियासत की सेना के पुनः संगठित होने के पहले श्रीनगर पर कब्जा करने के बजाय आजाद कश्मीर सेना सीमांत शहरो पर कब्जा करने और उसके निवासियों (गैर मुस्लिम) से लूटपाट एवं अन्य अत्याचार करने मे जुट गयी। पुंछ की घाटी मे रियासत की सेना पीछे हट कर शहरो मे केंद्रित हो गयीं और उनको कई महिनो के बाद भारतीय सेना घेरा बंदी से मुक्त कराया।

कश्मीर घाटी का भारतीय सुरक्षातंत्र Indian soldiers fighting in 1947 war

जम्मू और कश्मीर रियासत के भारत से विलय के बाद भारत ने विमान के द्वारा सैनिक और उपकरण श्रीनगर पहुंचाये। वहां पहुंच कर उन्होने रियासत की सेना को मजबूत किया और श्रीनगर के चारो ओर र्क सुरक्षा घेरा बनाया और आजाद कश्मीर सेना को हरा दिया। इस सुरक्षा घेरे मे भारतीय सेना के बख्तरबंद वाहनो के द्वारा विरोधियो को पीछे से घेरना भी शामिल था। हारकर पीछे हटती हुई पाकिस्तानी सेना का बारामुला और उरी तक पीछा करके इन दोनो शहरो को मुक्त करा लिया गया हालांकि पुंछ घाटी मे पाकिस्तानी सेना के द्वारा शहरो की घेरा बंदी जारी रही।

गिलगित मे आजाद कश्मीर की कबीलाई सेना मे गिलगित राज्य के अर्ध सैनिक बल शामिल हो गये और चित्राल के मेहतर जागीरदार की सेना भी अपने जागीरदार के पकिस्तान मे विलय की घोषणा के बाद उसमे शामिल हो गयी

पुंछ मे फसी सेनाओं तक पहुचने का प्रयास्

भारतीय सेना ने आजाद कश्मीर की सेना का उरी और बारामुला पर कब्जे के बाद पीछा करना बंद कर दिया और एक सहायता टुकड़ी को दक्षिण दिशा मे पुंछ की घेरा बंदी तोड़ने के प्रयास मे भेजा। हालांकि सहायता टुकड़ी पुंछ पहुच गयी पर वह घेराबंदी नही तोड़ पायी और वह भी फंस गयी। एक दूसरी सहायता टुकड़ी कोटली तक पहुच गयी पर उसे अपना कोटली की मोर्चाबंदी को छोड़कर पीछे हटना पड़ा इसी बीच मीरपुर पर आजाद कश्मीर की सेना का कब्जा हो गया।

पाकिस्तान/आजाद कश्मीर की सेना ने झांगेर पर कब्जा कर लिया तत्पश्चात उसने नौशेरा पर नकाम हमला किया। पाकिस्तान/आजाद कश्मीर की सेना की दूसरी टुकड़ीयों ने लगातार उरी पर नाकाम हमले किये। दूसरी ओर भारत ने एक छोटे से आक्रमण से छ्म्ब पर कब्जा बना लिया। इस समय तक भारतीय सेना के पास अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध हो गये ऐसे मे नियंत्रण रेखा पर स्थितियां स्थिर होने लगी।

अभियान विजय -- झांगेर पर प्रतिआक्रमण7 फरवरी 1948 - 1 मई 1948

भारतीय सेना बलों ने झांगेर और रजौरी पर प्रतिआक्रमण कर के उन्हे कब्जे मे ले लिया। कश्मीर घाटी मे आजाद कश्मीर सेना ने उरी के सुरक्षा तंत्र पर आक्रमण जारी रखा। आजाद कश्मीर सेना ने उत्तर मे स्कार्दू की घेरा बंदी कर दी।

भारतीय सेना का बसंत अभियान 1 मई 1948 -19 मई 1948

भारतीय सेना का बसंत अभियान

आजाद कश्मीर की सेना के अनेक प्रतिआक्रमणो के बावजूद भारतीयो ने झांगेर पर नियंत्रण बनाये रखा हालांकि अब आजाद कश्मीर की सेना को नियमित पाकिस्तानी सैनिको की मदद अधिकाधिक मिलने लगी थी। कश्मीर घाटी मे भारतीयो ने आक्रमण कर तिथवाल पर कब्जा कर लिया। उंचे हिमालय के क्षेत्रो मे आजाद कश्मीर की सेना को अच्छी बढत मिल रही थी। उन्होने टुकड़ियो की घुसपैठ कर के कारगिल पर घेराबंदी कर दी तथा स्कार्दू की मदद के लिये जा रहे भारतीय सैन्य दस्तों को हरा दिया।

अभियान गुलाब एवं इरेस (मिटाना)

भारतीय सेना बलो ने कश्मीर घाटी मे हमला जारी रखा और उत्तर की ओर आगे बढ कर केरान और गुराऐस पर कब्जा कर लिया। उन्होने तिथवाल पर किये गये एक प्रतिआकर्मण को वापस खदेड़ दिया। पुंछ घाटी मे पुंछ मे फसी भारतीय टुकड़ी घेराबंदी तोड़कर कुछ समय के लिये बाहरी दुनिया से वापस जुड़ गयी। लंबे समय से फसी कश्मीर रियासत की टुकड़ी गिलगित स्काउट (पाकिस्तान) से स्कार्दू की रक्षा करने मे अब तक सफल थी इस लिये पाकिस्तानी सेना लेह की ओर नही बढ पा रही थी। अगस्त मे चित्राल (पाकिस्तान) की सेना ने माता-उल-मुल्क के नेत्रुत्व मे स्कार्दू पर हमला कर दिया और तोपखाने की मदद से स्कार्दू पर कब्जा कर लिया। इससे गिलगित स्काउट लद्दाख की ओर आगे जाने का मौका मिल गया।

अभियान डक (बत्तख) 15 अगस्त 1948 - 1 नवम्बर् 1948

इस समय के दौरान नियंत्रण रेखा स्थापित होने लगी थी और दोनो पक्षो मे अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रो की रक्षा का ज्यादा महत्व था बनिस्बत की हमला करने के |इस दौरान केवल एक महत्वपूर्ण अभियान चलाया गया यह था अभियान डक जो कि भारतीय बलो द्वारा द्रास के कब्जे के लिये था इस दौरान पुंछ पर घेराबंदी जारी रही।

अभियान ईजी (आसान) पुंछ तक पहुचना 1 November 1948 - 26 November 1948

अब भारतीय सेना सभी क्षेत्रो पर पाकिस्तानी सेना और उससे समर्थित आजाद कश्मीर सेना पर भारी होने लगी थी। पुंछ को एक साल लंबी घेराबंदी से आजाद करा लिया गया था और गिलगित स्काउट जो कि अब तक अच्छी कामयाबी हासिल कर रही थी उसे उसे आखिरकार हराकर उसका पीछा करते हुए भारतीय सेना ने कारगिल को आजाद करा लिया पर आगे हमला करने के लिये भारतीय सेना को रसद की आपूर्ती की समस्या आ सकती थी अतः उन्हे रुकना पड़ा जोजिला दर्रे को टैंक की मदद से (इससे पहले इतनी उंचाई पर पूरे विश्व मे कभी भी टैंक का इस्तेमाल नही हुआ था) कब्जे मे ले लिया गया पाकिस्तानी सेना टैंक की अपेक्षा नही कर रही थी और उनके तुरंत पांव उखड़ गये। टैंक का इस्तेमाल बर्मा युद्ध से मिले अनुभव के कारण ही संभव हो पाया था। इस दर्रे पर कब्जे के बाद द्रास पर आसानी से कब्जा हो गया।

युद्ध विराम की ओर कदम 27 November1948 - 31 December 1948

लड़ाई के इस दौर मे पहुंचने पर भारतीय प्रधानमंत्री ने मामले को संयुक्त राष्ट्र महासभा मे ले जा कर उनके द्वारा मामले का समाधान करवाने का मन बना लिया। 31 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र के द्वारा युद्ध विराम की घोषणा की गई। युद्ध विराम होने से कुछ दिनों पहले पाकिस्तानी सेना ने एक प्रतिआक्रमण करके उरी और पुंछ के बीच के रास्ते पर कब्जा करके दोनो के बीच सड़क संपर्क तोड़ दिया। एक लंबे मोलभाव के बाद दोनो पक्ष युद्धविराम पर राजी हो गये। इस युद्धविराम की शर्तें[1] अगस्त 13,1948 को संयुक्त राष्ट्र ने अपनाया। इसमे पाकिस्तान को अपने नियमित और अनियमित सनिको को पूरी तरह से हटाने और भारत को राज्य मे कानून व्यवस्था लागू करने के लिये आवश्यक सैनिक रखने का प्रस्ताव था। इस शर्त के पूरा होने पर जनमत संग्रह करके राज्य के भविष्य और मालिकाना हक तय करने का निर्धारण होता। इस युद्ध मे दोनो पक्षो के लगभग १५-१५ सौ सैनिक मारे जाने का अनुमान है। [2]और इस युद्ध के बाद भारत का रियासत के साठ प्रतिशत और पाकिस्तान का ४० प्रतिशत भूभाग पर कब्जा रहा।

इस युद्ध से सीखी गयी सैन्य नीतियां

बख्तरबंद वाहन का प्रयोग

इस युद्ध के दो चरणो मे बख्तरबंद वाहन और हल्के टैंको का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण था इन दोनो मे ही बहुत ही कम संख्या मे इनका प्रयोग हुआ था। ये चरण थे

श्रीनगर पर प्रारंभिक हमले को नाकाम करना जिसमे भारत के २ बख्तरबंद वाहनो ने पाकिस्तान के अनियमित सैनिको के दस्ते पर पीछे से हमला कियाजोजिला दर्रे पर ११ हल्के टैंको की मदद से भारतीय सेना का कब्जा

यह घटनाएं यह बताती हैं कि असंभावित जगहो पर बख्तरबंद वाहनो के हमले का दुश्मन पर मानसिक दबाव पड़ता है। ऐसा भी हो सकता है की हमलावरों ने टैकरोधी हथियारो का प्रयोग नही किया शायद उन्होने आवश्यक न जानकर उन्हे पीछे ही छोड़ दिया। बख्तरबंद वाहनो के प्रयोग की सफलता ने भारत की युद्ध नीति पर गहरी छाप छोड़ी चीन के साथ युद्ध के वक्त भारतीयो ने बड़ी मेहनत से दुर्गम इलाको मे बख्तरबंद वाहनो का प्रयोग किया किंतु उस युद्ध मे बख्तर बंद वाहनो को अपेक्षित सफलता नही मिली।

सीमा रेखा मे आये बदलाव

सीमा रेखा मे आये परिवर्तनो का यदि अध्ययन किया जाय तो काफी रोचक तथ्य उभर कर आते हैं। एक बार सेनाओं का जमावड़ा पूरा होने के बाद नियंत्रण रेखा मे बदलाव बेहद धीमा हो गया और विजय केवल उन इलाकों तक सीमित हो गयी जिनमे सैनिक घनत्व कम था जैसे की उत्तरी हिमालय के उंचे इलाके जिनमे शुरुवात मे आजाद कश्मीर की सेना को सफलताएं मिली थी। १९४८ में पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण करके, उसके एक तिहाई भाग पर अधिकार कर लिया। अभी तक यह एक तिहाई भाग पाकिस्तान के पास है।

सेनांओ की तैनाती



जम्मू और कश्मीर रियासत की सेनाएं इस युद्ध के प्रारंभ मे फैली हुईं और छोटी संख्या मे केवल आतंकवादी हमलो से निपटने के लिये तैनात थीं। जिससे वे पारंपरिक सैनिक हमले के सामने निष्फल साबित हुई। इस रणनीति को भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंग्लादेश) मे भारत पाकिस्तान के बीच तीसरे युद्ध मे सफलता पूर्वक प्रयोग किया।

Saturday, July 2, 2016

Joke No - ०३४

Joke No - ०३४ 

Girls and Ghost

लड़कियों की ओर भूत क्‍यों आकर्षित होते हैं?


अक्सर सुनने में आता है कि उस लड़की को भूत ने पकड़ लिया या फिर फलां महिला के ऊपर भूत सवार हो गया। लेकिन यह सुनने में बहुत कम आता है कि किसी पुरूष के ऊपर भूत सवार हो गया हो। आख‍िर ऐसा क्यों होता है, पढिए यह महत्वपूर्ण लेख।

छात्राएं स्कूलों में बेहोश क्यों होती हैं?

लड़कियां और भूत - Girls and Ghost

पिछले कुछ समय से पाठशालाओं में कुछ छात्राओं के कुछ समय के लिये बेहोश होने की घटनाएं प्रकाश में आती रही है। कभी किसी जिले से तो कभी दूसरे जिले से। रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, सूरजपुर, कांकेर सहित मध्यप्रदेश के भी कुछ स्कूलों में ऐसी घटनाएं सामने आयी है, जिससे प्रभावित छात्राओं व स्कूलों में चिंता फैलने लगी। कुछ स्कूलों में भूतों का प्रकोप हो जाने की अफवाह फैली जिसमें आशंकित होकर कुछ पालकों ने डर के कारण अपनी बच्चियों को स्कूल जाने से मना कर दिया तो कुछ स्कूलों में तो बैगा बुलाकर झाड़ फूंक करायी गई। कुछ बच्चियों का स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया गया पर बच्चियों के बेहोश हो जाने का क्रम कुछ अंतराल में जारी रहा, जिससे भ्रम व असमंजस की स्थिति पैदा होने लगी कि आखिर क्यों हो जाती है बच्चियां स्कूलों में बेहोश, इस समस्या का निवारण कैसे हो।

स्कूल में बच्चियों के बेहोश हो जाने की घटना में से अनेक घटनाओं का मैंने परीक्षण किया, पीड़ित छात्राओं व उनके पालकों, शिक्षकों व ग्रामीणों से चर्चा भी की। कुछ ग्रामीण इन घटनाओं से काफी डरे हुए तथा भ्रम में थे। जब छात्राओं से पूछताछ की गई तब उन्होंने कहा उन्हें कुछ अस्पष्ट छाया या साया दिखता है जिससे वे डरकर बेहोश हो जाती है। कुछ ने सफेद कपड़े पहिने किसी महिला साया तो किसी छात्रा ने काले कपड़े पहिने भूत दिखने की बात बतायी।कुछ मामलों में बेहोश होने के पूर्व बड़बड़ाने हाथ-पैर पटकने की बात भी सामने आयी जबकि उन बच्चियों के आस पास बैठने वाली छात्राओं व छात्रों में से कुछ ने बताया कि वे सामने वाली बच्ची की असामान्य हरकत से डरकर बेहोश हो गई थी। कथित भूत/भूतनी न देखने की बात कही। सभी छात्राओं के चेहरे पर पानी छिड़कने के बाद आँखे खोलकर होश में आ जाती है, कुछ मामलों में ग्रामीण बच्चियों को अपने घर ले गये तथा कुछ स्कूलों में बैगाओं ने आकर झाड़ फूंक की पर जब यह घटना बार-बार घटी तो पाठकों व शिक्षकों में डर फैलने लगा।



स्कूलों में बेहोश हो जाने वाली घटनाओं में मैंने यह पाया कि सभी मामलों में कुछ बातें सामान्य है जैसे सभी घटनाएं ग्रामीण अंचल में स्थित शालाओं की है। पीड़ित बच्चियां गरीब, किसान, खेतिहर परिवार की सदस्य है। सभी बच्चियां स्कूल जाने के पहले व लौटने के बाद भी घर व खेत के काम में हाथ बंटाती है। उन सभी बच्चियों की पढ़ाई का स्तर औसत मध्यम स्तर से भी नीचे है। ऐसी बच्चियों के माता-पिता अशिक्षित या अल्प शिक्षित है जो बच्चियों को पढ़ाने व मार्गदर्शन दे पाने में असमर्थ है, उनमें शिक्षा, स्वास्थ्य की जागरूकता की जबरदस्त कमी है तथा वे झाड़ फूंक, बैगा- गुनिया पर यकीन करते हैं, कुछ बच्चियां शारीरिक कमजोरी कुपोषण, आत्मविश्वास की कमी, एनीमिया की शिकार पायी गयी है। सभी घटनाओं में पीड़ित बच्चियों की संख्या स्कूल में दर्ज बच्चियों से काफी कम है।

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बच्चों को सम्‍बोधित करते डॉ0 मिश्र



इस संबंध में एक खास पहलू पर भी हमें ध्यान रखने की आवश्यकता है कि स्कूलों में बेहोश होने की घटनाएं सिर्फ ग्रामीण अंचल के स्कूलों में ही क्यों होती है? आखिर बच्चियां ही क्यों बेहोश होती है, छात्र क्यों नहीं बेहोश होते, शहरों के स्कूलों,कान्वेन्ट स्कूलों में क्यों भूत नहीं आते? आखिर ये कैसे कथित भूत-प्रेत है जो सिर्फ गरीब, कुपोषित, अशिक्षित परिवार की बच्चियों को ही गांव-गांव जाकर बेहोश कर रहे हैं।

विविधताओं से भरे इस समाज में विभिन्न जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नागरिक है जिनमें से कुछ सामान्य शिक्षित तो काफी लोग ऐसे भी हैं जिन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। गरीबी व दूसरे कारणों से वे स्कूल का मुंह भी नहीं देख पाये। हमारा कृषि प्रधान देश है,गांव में रहने वाले अधिकांश कृषक, मजदूर जिनकी संख्या अस्सी प्रतिशत से अधिक है उनके पास उपलब्ध शिक्षा,स्वास्थ्य की सुविधा में तथा हमारे देश के चंद बड़े शहरों मंक उपलब्ध स्वास्थ्य व शिक्षा के अवसरों में जमीन आसमान का फर्क है। अनेक स्थानों पर वे आज भी बैगाओं व ओझाओं की बातों का पूरा भरोसा करते हैं जो गांव में हमेशा उपलब्ध रहते हैं। बहुसंख्यक ग्रामीण गांव में जानवर के गुमने, बच्चे बीमार होने,गाय के दूध न देने, फसल व संक्रामक बीमारियों तक के परामर्श के लिये वे सहज उपलब्ध बैगा के पास फूंकवाने, झड़वाने जाते हैं। जो हर प्रतिकूल परिस्थिति में भूत, प्रेत, देवी देवता, तंत्र-मंत्र से बांधा जाना आदि बताकर न केवल उन्हें गुमराह करता है बल्कि उनका शोषण भी करता है, अनेक मामलों में पंचायतें बैगाओं का खुला विरोध नहीं कर पाती उनके फैसले में मूकदर्शक बनी रहती है।

हमने यह पाया है कि ऐसे मामलों में कुछ बच्चे ऐसी वस्तुओं जैसे सफेद साड़ी पहिनी औरत, लाल कपड़ा, काला कपड़ा वाला भूत के दिखने की बातें बताते हैं जो आस-पास यहां तक उनके अगल-बगल भी बैठे बच्चों को दिखाई नहीं देती। कुछ बच्चे ऐसे ही कुछ आवाजों के सुनने की भी बातें करते हैं जो बाकी लोगों को सुनाई नहीं देती। कुछ ग्रामीण व बच्चे इसे अन्य व्यक्ति का कारनामा तो कुछ इसे भूत-प्रेत, देवी देवता का दिखना मानते हैं।



वास्तव में अनोखी व रहस्यात्मक लगने वाली यह सब व्यक्तिगत अनुभव व बाते इन्द्रिय जनित भ्रम के अलावा कुछ नहीं है। मनोवैज्ञानिक इस प्रकार के अनुभव को व्यक्ति के व्यक्तित्व,मनोव्यवहार में आये बदलाव व मानसिक स्थिति में आये परिवर्तन के नजरिये से देखते हैं। वास्तव में जब हमारी इन्द्रियां जब भ्रम की अवस्था में होती है तब ऐसी घटनाएं कोई भी व्यक्ति महसूस कर सकता है।



उदाहरण के तौर पर स्टेशन में किसी दूसरे ट्रेन के चलने पर सामानांतर पटरी पर खड़ी जिस ट्रेन में स्वयं बैठे है के चलने का अभास होना। किसी कड़वी या तीखी वस्तु के खाने के बाद सामान्य पानी में मिठास अनुभव करना, किसी की अंदर दरवाजें के बंद होने की अवाज नहीं होने पर भी सुनाई पड़ना।



भूत-प्रेत दिखना,उनकी आवाजें सुनना भी इसी प्रकार का भ्रम है। कोई व्यक्ति किसी मामले या घटना के संबंध में बार-बार सुनने व विचार करता है तब उन तथ्यों को मस्तिष्क में ग्रहण करता है जो किसी रहस्यमयी आवाजों,चित्रों, वरदानों श्रापों के बारे में भी हो सकते हैं। शरीरिक अस्वस्थता,चोंटे,किस्से कहानियां,अफवाहें, मादक द्रव्य, कुछ दवाएं ऐसी भ्रम को बढ़ाने का काम करती है, मानसिक तनाव, अनिद्रा, चिंता भी ऐसे लक्षणों को जन्म दे सकता है।



हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ग्रामीण अंचल की छात्राएं जिन विपरीत परिस्थितियों में रह रही है, पढ़ रही है उनकी स्थिति सुधारने की आवश्यकता है। उन्हें पढ़ाई करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता, उसे स्कूल आने के पहले से लेकर स्कूल जाने के बाद भी घर का काम करना पड़ता है। पढ़ाई समझ में न आने की कठिनाई, संसाधन की कमी, परीक्षा का डर उनके मस्तिष्क में दबाव बनाकर रखता है। किसी मनोवैज्ञानिक ने कहा हैं बच्चों में स्कूल का डर सबसे अधिक देखा गया है। कोई भी छोटा बच्चा जो घर से स्कूल जाना शुरू करता है तो प्रारंभ में ही अपने आपको असुरक्षित महसूस करता है। सभी बच्चे एक जैसे नहीं होते, उनकी रूचियां,व्यवहार एक-दूसरे से कुछ न कुछ अलग रहता है।



कुछ बच्चे स्कूल में अकेलापन भी महसूस करते हैं, कुछ बच्चे तो स्कूल न जाने के लिए पेट दर्द, सिर दर्द तबियत खराब लगने के बहाने भी बनाते हैं। कभी होमवर्क न कर पाने व परीक्षा की तैयारी न होने से प्रताड़ना के डर से स्कूल न जाने व यहां तक नंबर कम पाने के भय से कभी परीक्षा में भी गेप ले लेते हैं। गांवों में तो हाल इससे भी खराब है, बच्चों में होने वाली इस शारीरिक मनोवैज्ञानिक समस्य को सामाजिक, मानसिक समस्या मानकर निपटने की आवश्यकता है। बच्चों के लिये शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार करते समय हमें इस बारे में भी सकारात्मक परिवर्तन करने की आवश्यकता है।





-डॉ0 दिनेश मिश्र

देहाती मानसून

नेमुआ की मम्मी
हो नेमुआ के पप्पा..
ई अंचरा घाम से भिंगाऐ इ चाहे मेघा से भिंगाइ..
तोहर ठोरवा पर ई मुस्कनियां काहे बढ़ जावेला हो.??


नेमुआ के पप्पा
















ओहि समय जखन हम नेना रही
आ खाली तोतराइत रही
हमरा घरक छहरदेबालीक ओहि पारसँ
सिसकीक स्वर आतंकित करैत छल
ओहि हो-हल्लाक सूचीमे
टांकल छलि एकटा स्त्री
पिरामिडमे बन्न ममी जकाँ
नहि जानि के चोरा क’
ओकरामे थोड़ेक जीवन द’ देने छलैक
कतहुसँ जबरदस्ती पकड़ि क’ आनल गेल छिल ओ
पहिचानक लेल ओकरा लाल रंग सँ
चिन्हित क’ देल गेल छलैक
हमर तोताराइत बुद्धिकें बस इएह टा ज्ञात छल

आब जखन कि हम
काटि चुकल छी वयसक आधा गीरह
ओ स्वर आ हो-हल्ला अपन विविध रूपमे
हमरा घरक खिड़कीसँ होइत
निरन्तर टकराइत अछि देबालसँ

साँझकें बड़दक गरदनिक घंटी सुनाइ दैत अछि
ओकर सानी-कुट्टी लेल
गतिशील हाथक चूड़ीक खनक सुनाइ दैत अछि
केश खौंचि पछुआरमे पटकि देबाक
आ रोटी छीनि क’ थारी फेकबाक
भूख आ रोटीक बेचैनी
विचलित होइत रहल छी दशक-दशकसँ
हमरा खिड़कीमे किऐक नहि
हुलकैत अछि ओ स्त्री
एक बेर तड़पि क’
फानि क’ छहरदेबाली
ओकरा हमरा घरमे निश्चिते
निश्चिते आबि जएबाक चाही।

Friday, July 1, 2016

Pakistanin Reporter Qaamat Bano

हैदराबाद (पाकिस्तान) से
‘कयामत बानो’ की रिपोर्ट 


सरकार और दालों के किमतां इत्ते बढ़े हुए हैं कि गऱीब लोगां कू एक वखत सालन बनाने कू भी सौ वखत सोचना पड़ रा.. पेश है महँगाई पर एक रिपोर्ट – पाक के प्राइममनिस्टर शरीफ़ मियां बाहिर मुल्कां के दौरे करके पाकिस्तान कू वापिस आ गए.. सेल्फियां में तीनों अलग-अलग मुल्कां के अलग-अलग डिसों से मज़े उड़ाते दिखे.. लोगां हैरान है कि ‘पी एम मां’ को क्या सूझ री है कि आते जा रए जाते जा रए.. चुनाव के दिनां में “अच्छे दिनां आने वाले हैं!” करके लोगां कू बोले थे.. असल में हम छोले हैं जो उनका मतलब नक्को समझे.. अच्छे दिनां उनके खुद आने वाले हैं करके बोले थे.. हम इसे अपने अच्छे दिन सोच रए थे.. अच्छे दिनां आना तो दूर की बात पहले वाले दिन ही आ जाएँ तो अच्छा है.. मालूम नक्को शरीफ़ मियां को बाहर के लोगां क्या-क्या खिलाए.. हम गरीबां को तो घर की बनी हरी मिर्ची की चटनी और ज्वार के रोटियां खाने कू भी नसीब़ नक्को हो रई.. हरी मिर्चियां भी बोले तो 100 रुपया से कम कू नक्को मिल रए.. कम से कम टमाटर की चटनी खा ले के तसल्ली करते, मगर टमाटरां भी सौ रुपिया किल्लो से मिल रए.. “दाल रोटी खाओ प्रभू के गुण गाओ” बोल ले के अपने दिल को मना लेंगे बोले तो दालां भी कौन से सस्ते हैं.? दालां भी 80 रुपय से लेकर 200 रुपय तक के हो गएले हैं.. हमारे रियासत में गनिमत है चावलां 1 रुपय किल्लो से मिल रए हैं.. नमक 10 रुपय किल्लो से मिल रा.. मगर पब्लिक को क्या करना. खाली खाना और नमक खाना.? काए कू बोले तो सालनां तो खाब होते जा रए.. हरा मसाला खरिदेंगे बोले तो भी सोचना पड़ रा.. ये महँगाई के दिनां में काए को हरी-हरी सूझ रही.? 

बरहाल ये महँगाई के दिनो में सालनां आम आदमी के कटोरों से दूर हो के अमीर लोगां के दस्तख्वानों पर चले गवे हैं.. गरीबां के हवा खाने के और आंसुआँ पिने के दिन आ गवे हैं..

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